सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव और बदलती जीवनशैली का असर अब बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर साफ दिखाई देने लगा है। विशेषज्ञों के मुताबिक बच्चों और किशोरों में ईटिंग डिसऑर्डर यानी खाने से जुड़ी गंभीर समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। यह केवल खानपान की खराब आदत नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य से जुड़ी एक गंभीर स्थिति मानी जाती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि जब बच्चा अपने शरीर, वजन या खाने को लेकर जरूरत से ज्यादा सोचने लगे, तो यह चिंता का विषय हो सकता है। कई बच्चे खुद को दूसरों से तुलना करने लगते हैं और सोशल मीडिया पर दिखने वाली ‘परफेक्ट बॉडी’ की तस्वीरों से प्रभावित होकर अपने खानपान में अस्वस्थ बदलाव करने लगते हैं।
यूनिसेफ के अनुसार, ईटिंग डिसऑर्डर को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। इस स्थिति में बच्चा अपने आत्मविश्वास को शरीर की बनावट और वजन से जोड़ने लगता है। खाने के समय तनाव महसूस करना, बार-बार वजन चेक करना, खुद को मोटा समझना या भोजन से दूरी बनाना इसके शुरुआती संकेत माने जाते हैं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि मानसिक तनाव, एंग्जायटी, डिप्रेशन, परिवार का माहौल और सोशल मीडिया का दबाव इस समस्या को बढ़ा सकता है। अगर बच्चा लगातार कैलोरी गिनने लगे, कुछ चीजें खाने से पूरी तरह बचने लगे, जरूरत से ज्यादा व्यायाम करे या चोरी-छिपे खाना खाए, तो माता-पिता को सतर्क हो जाना चाहिए।
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि समय रहते पहचान और सही इलाज से इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है। माता-पिता को बच्चों से प्यार और समझदारी के साथ बात करनी चाहिए। बच्चों को यह एहसास दिलाना जरूरी है कि स्वस्थ रहना केवल पतला दिखने से नहीं, बल्कि संतुलित खानपान और अच्छे मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा है।
विशेषज्ञ घर का माहौल सकारात्मक रखने की सलाह देते हैं। बच्चों के सामने वजन या शरीर को लेकर नकारात्मक बातें करने से बचना चाहिए। साथ ही माता-पिता को खुद भी स्वस्थ खानपान और नियमित व्यायाम अपनाना चाहिए, क्योंकि बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने घर में देखते हैं।








