तृप्ति सिंह, देहरादून। आज देश जिन चमचमाते एक्सप्रेसवे और राष्ट्रीय राजमार्गों पर रफ्तार भर रहा है, उसकी मजबूत नींव वास्तव में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में रखी गई थी। इस महात्वाकांक्षी विजन को धरातल पर उतारने का श्रेय जिस व्यक्ति को जाता है, वह कोई और नहीं बल्कि तत्कालीन केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी थे। एक सैन्य इंजीनियर के रूप में उनका पिछला अनुभव देश के बुनियादी ढांचे को बदलने में सबसे बड़ा हथियार साबित हुआ। जब अटल जी ने देश के चारों कोनों को जोड़ने का सपना देखा, तो उन्होंने इस बेहद जटिल और विशालकाय जिम्मेदारी के लिए जनरल खंडूड़ी पर भरोसा जताया। वे सही मायनों में अटल जी के ‘राइट हैंड’ बनकर उभरे और देश में एक ऐसी अभूतपूर्व सड़क क्रांति की शुरुआत की, जिसने भारत के आर्थिक और सामाजिक भूगोल को हमेशा के लिए बदल दिया।
इस विकास यात्रा का सबसे चमकता हुआ अध्याय ‘स्वर्ण चतुर्भुज परियोजना’ थी। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता जैसे देश के चार बड़े महानगरों को आपस में जोड़ने वाली यह उस समय की सबसे बड़ी और महत्वाकांक्षी योजना थी। इस विशालकाय परियोजना को समय सीमा के भीतर और पूरी गुणवत्ता के साथ पूरा कराना एक बड़ी चुनौती थी, लेकिन जनरल खंडूड़ी ने इसमें अपने सैन्य अनुशासन को लागू किया। वे खुद हर तकनीकी बारीकी पर नजर रखते थे और काम में किसी भी तरह की ढिलाई या भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं करते थे। उनके इसी कड़े रुख और फौजी मिजाज का नतीजा था कि देश के इतिहास की यह सबसे बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना तय समय के भीतर परवान चढ़ सकी।
सड़कों का यह जाल सिर्फ महानगरों तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि जनरल खंडूड़ी ने देश के सुदूर ग्रामीण इलाकों की तकलीफों को भी बखूबी समझा। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना को धरातल पर मजबूती से लागू करने में उन्होंने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। विशेषकर उत्तराखंड जैसे कठिन भौगोलिक स्थिति वाले पहाड़ी राज्यों के लिए उनका यह प्रयास किसी वरदान से कम नहीं था। सदियों से अलग-थलग पड़े पहाड़ों और गांवों तक जब पहली बार पक्की सड़कें पहुंचीं, तो वहां के लोगों की जिंदगी में विकास का एक नया सूरज उगा। उनके इसी भागीरथी प्रयास और दूरदर्शी सोच के कारण उन्हें ‘आधुनिक सड़क संरचना का वास्तुकार’ कहा जाता है। उन्होंने यह साबित किया कि सड़कें केवल कंक्रीट का रास्ता नहीं होतीं, बल्कि वे राष्ट्र की प्रगति की धमनियां होती हैं। आज भले ही वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन देश के नक्शे पर बिछा सड़कों का यह अनंत जाल उनकी कर्मठता और राष्ट्र सेवा की गवाही हमेशा देता रहेगा।








