—मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी जी के निधन से देश में शोक व्याप्त
— पैंतीस वर्षों तक भारतीय सेना में रहकर देश की सीमाओं की रक्षा की
— अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में सड़क परिवहन मंत्री बनकर हाईवे का जाल बिछाया
— ‘खंडूरी है जरूरी’ के नारे को सच साबित करके दिखाया, मुख्यमंत्री बनते ही भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसी
-अमरनाथ सिंह, देहरादून।
भारतीय राजनीति में जब भी शुचिता, अनुशासन और अदम्य ईमानदारी का जिक्र होगा, मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी (सेनि) का नाम सबसे अग्रिम पंक्ति में लिया जाएगा। उनके जाने से न केवल देवभूमि उत्तराखंड ने अपना एक ओजस्वी अभिभावक खो दिया है, बल्कि देश की राजनीति ने भी एक ऐसा अनमोल हीरा खो दिया है जिसकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ने वाली। एक फौजी के रूप में देश की सीमाओं की रक्षा करने से लेकर, नीति-नियंता बनकर आधुनिक भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर की नींव रखने और फिर मुख्यमंत्री के तौर पर एक नवोदित राज्य को ईमानदारी का पाठ पढ़ाने तक, जनरल साहब का पूरा जीवन राष्ट्र सेवा की एक अनूठी गाथा है। वे उन गिने-चुने नेताओं में से थे जिन्होंने सत्ता को कभी सुख-सुविधा का साधन नहीं माना, बल्कि उसे जनता के प्रति एक पवित्र जिम्मेदारी की तरह जिया।
लगभग पैंतीस वर्षों तक भारतीय सेना में अपनी बहादुरी और रणनीति का लोहा मनवाने के बाद जब वे मेजर जनरल के पद से सेवानिवृत्त हुए, तो आराम की जिंदगी चुनने के बजाय उन्होंने राजनीति के कठिन पथ को चुना। वे गढ़वाल से सांसद चुनकर संसद पहुंचे और केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में सड़क परिवहन मंत्री बने। यह वह दौर था जब भारत आधुनिक सड़कों के मामले में दुनिया से पिछड़ रहा था। जनरल साहब ने देश की रगों में दौड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों और स्वर्णिम चतुर्भुज योजना जैसे महात्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स को अपनी फौजी कार्यशैली से गति दी। उन्होंने देश के कोने-कोने में सड़कों का ऐसा मजबूत जाल बिछाया जिसने न सिर्फ आर्थिक तरक्की के रास्ते खोले, बल्कि दूरदराज के गांवों को मुख्यधारा से जोड़ दिया।
उनकी इसी बेदाग छवि और प्रशासनिक दक्षता को देखते हुए साल 2007 में उन्हें उत्तराखंड की कमान सौंपी गई। एक नए राज्य को विकास की पटरी पर दौड़ाने के लिए जिस विजन की जरूरत थी, वह खंडूरी जी के पास था। मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालते ही उन्होंने सबसे पहले सिस्टम की सफाई की। नौकरशाही में जवाबदेही तय की और भ्रष्टाचार पर इतनी तगड़ी चोट की कि बिचौलियों, ठेकेदारों और भ्रष्ट अफसरों के हौसले पस्त हो गए। उत्तराखंड की अस्मिता को बचाने के लिए उन्होंने जमीन खरीद के बेहद सख्त नियम लागू किए, ताकि राज्य की बेशकीमती जमीनों को बाहरी भू-माफियाओं के चंगुल से बचाया जा सके। उनके इस कड़े अनुशासन से जनता तो बेहद खुश थी, लेकिन व्यवस्था के भीतर बैठे कुछ निहित स्वार्थी तत्वों को यह रास नहीं आया। नतीजतन, पार्टी के भीतर ही असंतोष पनपने लगा और अपनी ही सरकार को बेदाग चलाने वाले इस नायक को राजनीतिक गुणा-भाग के चलते पद से हटा दिया गया। लेकिन जब भी राज्य में सुशासन की बात आई, जनता ने हमेशा उन्हें ही याद किया। यही वजह थी कि उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री बनाया गया और उन्होंने ‘खंडूरी है जरूरी’ के नारे को अपनी ईमानदारी से सच साबित करके दिखाया।
जनरल साहब की राष्ट्रभक्ति किसी पद या दल की सीमाओं में कभी नहीं बंधी। सांसद रहते हुए जब वे संसद की रक्षा संबंधी स्थायी समिति के अध्यक्ष बने, तो उन्होंने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सेना और सैनिकों के हितों की बात की। देश की सुरक्षा को सर्वोपरि मानते हुए उन्होंने सैनिकों के लिए बुलेटप्रूफ जैकेट, आधुनिक गोला-बारूद और साजो-सामान की कमी पर अपनी ही सरकार के सामने बेहद तल्ख और बेबाक टिप्पणियां कीं। उन्होंने साफ कहा था कि देश की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। उनकी यह निर्भीकता बताती है कि उनके भीतर का फौजी हमेशा एक नेता से बड़ा और सजग रहा।
आज के दौर में जहां राजनीति में अपनी छवि चमकाने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया जाता है, वहां खंडूरी साहब अपनी सादगी और ऊंचे नैतिक मूल्यों के कारण एक मिसाल बनकर रहे। वे जितने सख्त प्रशासक थे, व्यक्तिगत जीवन में उतने ही सरल, सुलभ और सहृदय व्यक्ति थे। केदारनाथ आपदा के बाद अनाथ हुए पुरोहितों के एक पूरे गांव को गोद लेना और उनके पुनर्वास के लिए चुपचाप काम करना, उनके भीतर छिपी मानवीय करुणा का सबसे बड़ा प्रमाण है। देवभूमि उत्तराखंड के पहाड़ों में कनेक्टिविटी बढ़ाना और अंत्योदय की भावना से काम करना ही उनका एकमात्र लक्ष्य था। जनरल साहब आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी सिर उठाकर पूरी ईमानदारी से जीने का जो रास्ता उन्होंने दिखाया है, वह आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करता रहेगा। इतिहास उन्हें एक ऐसे पथ-प्रदर्शक के रूप में याद रखेगा जिसने भारतीय राजनीति को मर्यादा, शुचिता और सेवा का वास्तविक अर्थ सिखाया। उन्हें कोटि-कोटि नमन और विनम्र श्रद्धांजलि।








