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चुनाव खर्च पर तीखा व्यंग्य: क्या ‘ऑनलाइन वोटिंग’ से चल सकता है देश?

नई दिल्ली। भारतीय लोकतंत्र में चुनावी प्रक्रिया पर होने वाले भारी-भरकम खर्च को लेकर एक व्यंग्यात्मक नजरिया सामने आया है, जिसमें व्यवस्था की विडंबनाओं पर तीखा कटाक्ष किया गया है। लेख में कहा गया है कि देश में नेताओं को चुनने के लिए हर चुनाव में अरबों रुपये खर्च किए जाते हैं, जबकि विकास के लिए संसाधनों की कमी का रोना रोया जाता है।

व्यंग्य के माध्यम से सुझाव दिया गया है कि यदि देश को वास्तव में बचत करनी है, तो कुछ समय के लिए चुनावों को ‘म्यूट मोड’ पर डालने का विचार किया जा सकता है। आधुनिक तकनीक के दौर में जब हर सुविधा मोबाइल ऐप पर उपलब्ध है, तो नेताओं का चयन भी डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए क्यों नहीं किया जा सकता? लेख में तंज कसते हुए कहा गया है कि सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा लाइक और शेयर पाने वाले नेता को ही सत्ता सौंप दी जाए, जिससे चुनावी खर्च में भारी कटौती हो सकती है।

लेख में यह भी कहा गया है कि पुरानी सरकारों को ‘विंटेज’ मानकर उनका कार्यकाल बढ़ाया जा सकता है, ठीक उसी तरह जैसे लोग पुराने फैशन को नया नाम देकर अपनाते हैं। इससे चुनावी खर्च बचेगा और उन पैसों से बुनियादी विकास कार्य पूरे किए जा सकेंगे, जो वर्षों से लंबित हैं।

इसके अलावा चुनावी रैलियों, पोस्टरों और प्रचार सामग्री पर होने वाले खर्च को भी गैर-जरूरी बताते हुए सुझाव दिया गया है कि इन संसाधनों का उपयोग शिक्षा और सामाजिक कार्यों में किया जा सकता है। व्हाट्सएप जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए घोषणापत्र जारी करने का विचार भी सामने रखा गया है, जिससे सुरक्षा और ट्रैफिक जैसी समस्याओं से बचा जा सके।

अंत में लेख इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि देश के विकास के लिए केवल धन ही नहीं, बल्कि नीयत का भी मजबूत होना जरूरी है। जब तक व्यवस्था में पारदर्शिता और जिम्मेदारी नहीं आएगी, तब तक खर्च कम करने के उपाय सिर्फ व्यंग्य तक ही सीमित रहेंगे।

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