आज का शहरी जीवन एक अजीब विडंबना में फंस गया है, जहां इंसान अपने ही घर में मालिक कम और छोटे-छोटे जीवों का प्रबंधक अधिक बनता जा रहा है। मच्छर, मक्खी, चूहे, कॉकरोच और छिपकलियां अब महज कीड़े-मकोड़े नहीं रहे, बल्कि घर के स्थायी ‘निवासी’ बन चुके हैं।
व्यंग्यात्मक अंदाज में यह सवाल उठता है कि जब सरकार इंसानों के लिए आवास योजनाएं बना सकती है, तो इन जीवों के लिए अलग ‘रहने की व्यवस्था’ क्यों नहीं? उदाहरण के तौर पर, मच्छरों के लिए ‘मच्छर विहार’ या ‘मच्छर एन्क्लेव’ बनाया जा सकता है, जहां उन्हें गंदा पानी और खुली नालियां उपलब्ध हों। इससे वे इंसानों के घरों में घुसपैठ कम कर सकते हैं।
इसी तरह मक्खियों के लिए ‘मक्खी कॉलोनी’ या ‘रिसॉर्ट’ की कल्पना की गई है, जहां कूड़ा-कचरा व्यवस्थित रूप से उपलब्ध कराया जाए, ताकि वे भोजन की तलाश में इंसानों की थाली तक न पहुंचें।
चूहों के लिए ‘अंडरग्राउंड टाउनशिप’ का विचार भी कम दिलचस्प नहीं है। चूहे अक्सर घरों और दफ्तरों में फाइलों और सामान को नुकसान पहुंचाते हैं। अगर उनके लिए अलग व्यवस्था हो, तो इंसानों की संपत्ति सुरक्षित रह सकती है।
रसोई में छिपकलियों और कॉकरोच की बढ़ती मौजूदगी को देखते हुए ‘स्पेशल इको जोन’ या ‘वर्टिकल हाउसिंग’ का सुझाव भी दिया गया है, जहां वे बिना किसी टकराव के रह सकें।
यह व्यंग्य केवल हंसी-मजाक नहीं, बल्कि एक गंभीर संदेश भी देता है—आज इंसान अपने ही घर में शांति और सुकून के लिए संघर्ष कर रहा है। अगर इन ‘अनचाहे मेहमानों’ के लिए कोई समाधान नहीं निकाला गया, तो इंसान को अपने ही घर में चैन से रहने के लिए और ज्यादा प्रयास करने पड़ेंगे।








