देश में आर्थिक असमानता लगातार बढ़ती जा रही है, जिससे अमीर और गरीब के बीच की खाई और गहरी होती दिख रही है। हाल ही में सेंटर फॉर अकाउंटेबिलिटी (सीएफए) की एक रिपोर्ट ने इस स्थिति को लेकर गंभीर चिंता जताई है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले छह वर्षों में देश के अमीरों की संपत्ति में 227 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि अरबपतियों की संख्या में भी 77 प्रतिशत का इजाफा हुआ है।
रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2019 में जहां अमीरों की कुल संपत्ति करीब 31 लाख करोड़ रुपये थी, वहीं 2025 तक यह बढ़कर 88 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि देश के मात्र 1 प्रतिशत अमीरों के पास कुल संपत्ति का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा है, जबकि बाकी 99 प्रतिशत आबादी के पास केवल 60 प्रतिशत संपत्ति ही है।
रिपोर्ट में देश के प्रमुख उद्योगपतियों की संपत्ति में हुई तेजी से बढ़ोतरी का भी जिक्र किया गया है। गौतम अडानी के परिवार की संपत्ति में सबसे अधिक वृद्धि देखी गई, जबकि मुकेश अंबानी समेत अन्य बड़े उद्योगपतियों की संपत्ति में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बढ़ती असमानता के पीछे सरकारी नीतियां और निजीकरण की बढ़ती प्रवृत्ति एक बड़ा कारण है। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे बुनियादी क्षेत्रों में सरकारी हस्तक्षेप कम होने से आम लोगों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। वहीं सरकारी नौकरियों में कमी और निजी क्षेत्र में श्रमिकों के अधिकार कमजोर होने से रोजगार की स्थिति भी अस्थिर हो गई है।
आर्थिक विशेषज्ञों का सुझाव है कि यदि सरकार वास्तव में इस खाई को कम करना चाहती है, तो उसे रोजगार सृजन, कौशल विकास और शिक्षा-स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाने पर ध्यान देना होगा। केवल मुफ्त योजनाओं के जरिए समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।
समग्र रूप से यह स्पष्ट है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आर्थिक असमानता भविष्य में और गंभीर रूप ले सकती है।








