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20 करोड़ मुसलमान असुरक्षित क्यों महसूस कर रहे हैं? रिपोर्टों में क्या छिपा सच है

नई दिल्ली। देश की राजनीति, नीतियों और सामाजिक माहौल पर अब एक गंभीर प्रश्न बार-बार उभरने लगा है—क्या भारत की अल्पसंख्यक आबादी को धीरे-धीरे हाशिये पर धकेला जा रहा है? यह सवाल इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि पिछले एक दशक में जिस तरह की घटनाएँ, नीतिगत बदलाव और सामाजिक तनाव सामने आया है, उसने एक बड़े वर्ग को असुरक्षित और उपेक्षित होने का एहसास कराया है।

2014 के बाद से शासन, संस्थाओं और समाज में आए बदलावों को लेकर कई रिपोर्टें लगातार चेतावनी देती रही हैं। अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) से लेकर देश के अंदर के कई सामाजिक अध्ययन, सब यह इशारा करते हैं कि अल्पसंख्यक—खासकर मुसलमान—सामाजिक-आर्थिक स्तर पर पीछे जा रहे हैं और नीतिगत भेदभाव का प्रभाव उन पर अधिक दिख रहा है।

सरकार अपनी ओर से “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” को मुख्य मंत्र बताती है, लेकिन जमीनी वास्तविकता कई बार इससे उलट दिखाई देती है। नागरिकता से जुड़े कानून, धर्मांतरण विधेयक, गाय से जुड़े नए नियम, मदरसों और अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों पर बढ़ता प्रशासनिक दवाब… इन सबका प्रभाव सबसे अधिक मुसलमानों पर ही पड़ा है। सवाल यह उठता है कि यह सब संयोग है या एक पैटर्न बन रहा है?

देश में भीड़-हिंसा की घटनाएँ बढ़ीं, कई बार आरोप लगा कि ऐसी घटनाएँ रोकने की जगह उन्हें सामाजिक या राजनीतिक संरक्षण मिला। रोजगार, व्यापार और सरकारी क्षेत्रों में मुसलमानों की भागीदारी लगातार घटती गई। कई राज्यों में अल्पसंख्यक छात्रवृत्तियाँ कम की गईं या बंद कर दी गईं, जिससे शैक्षणिक अवसर भी सीमित होने लगे।

इसी बीच, कई सामाजिक संगठनों और विपक्षी दलों का आरोप है कि मौजूदा सत्ता संरचना धर्म आधारित ध्रुवीकरण की राजनीति को बढ़ावा देती है। वहीं, RSS-BJP गठजोड़ पर भी communal माहौल को बढ़ाने की आलोचना होती रही है। हालांकि सरकार इन आरोपों को खारिज करती है और कहती है कि उसकी नीतियाँ पूरी तरह विकास-उन्मुख और समानता आधारित हैं।

लेकिन सवाल यह भी है कि यदि सब कुछ बराबरी और विकास की दिशा में ही हो रहा है, तो फिर 20 करोड़ मुसलमान—जो देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी हैं—अपने ही देश में खौफ, असुरक्षा और उपेक्षा क्यों महसूस कर रहे हैं?

रोज़गार और आर्थिक मोर्चे पर भी मुसलमानों का प्रतिनिधित्व गिरने की बात कई सर्वेक्षणों में सामने आई है। सरकारी नौकरियों में उनकी संख्या बेहद कम है, व्यापारिक गतिविधियों पर कई स्थानीय प्रतिबंधों का असर दिख रहा है, और व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं को लेकर भी चिंता बढ़ी है।

भारत जैसे विविधता वाले राष्ट्र में यदि कोई बड़ा समुदाय शासन व्यवस्था, न्याय और संविधान पर भरोसा खोने लगे, तो उसका नुकसान सिर्फ उसी समुदाय को नहीं, बल्कि पूरे देश को उठाना पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मत है कि राष्ट्र तभी आगे बढ़ सकता है जब उसके सभी नागरिक समान अवसर, सुरक्षा और सम्मान महसूस करें।

आज सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या भारत वास्तव में एक समावेशी और बराबरी वाले भविष्य की ओर बढ़ रहा है, या फिर कहीं बिना महसूस किए हम एक ऐसे रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं जहाँ असमानता और सामाजिक दूरी ही नई सामान्य स्थिति बन जाए?

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