आईजोल।
देश के महानगरों में ट्रैफिक जाम का नाम सुनते ही कानों में हॉर्न की कर्कश आवाज, लेन तोड़ते वाहन और सड़क पर बढ़ता तनाव याद आ जाता है। कई बार यह स्थिति रोड रेज और दुर्घटनाओं में भी बदल जाती है। लेकिन देश में एक शहर ऐसा भी है, जहां घंटों के ट्रैफिक जाम में भी न तो हॉर्न बजता है, न ही कोई आगे निकलने की होड़ दिखाई देती है। यह शहर है मिजोरम की राजधानी आईजोल।
आईजोल की सड़कें संकरी और पहाड़ी हैं। यहां ट्रैफिक जाम रोजमर्रा की समस्या है, लेकिन इसके बावजूद यहां का ट्रैफिक अनुशासन पूरे देश के लिए एक उदाहरण बन चुका है। यहां कारें बाईं लेन में और दोपहिया वाहन दाईं लेन में चलते हैं। लोग बिना किसी पुलिस दबाव के अपनी लेन में धैर्यपूर्वक खड़े रहते हैं और जाम खुलने का इंतजार करते हैं। शायद यही वजह है कि आईजोल को ‘साइलेंट सिटी ऑफ इंडिया’ कहा जाता है।
स्थानीय निवासी मल्सॉव्मी ह्नाम्ते बताते हैं कि यह व्यवहार किसी नियम या चालान के डर से नहीं, बल्कि संस्कृति और आपसी सम्मान से उपजा है। उनके शब्दों में, “हम दूसरों के समय और सुरक्षा का सम्मान करते हैं। लेन बदलना या ओवरटेक करना हमारी आदत में नहीं है।” यहां के लोग मानते हैं कि संकीर्ण सड़कों पर अगर अनुशासन न हो, तो जाम और हादसे दोनों बढ़ सकते हैं।
इस अनुशासन का सबसे बड़ा लाभ यह है कि ध्वनि प्रदूषण बेहद कम है। हॉर्न का इस्तेमाल न के बराबर होता है और रोड रेज जैसी घटनाएं लगभग नहीं के बराबर हैं। ट्रैफिक चाहे जितना धीमा हो, लोग अपना संयम नहीं खोते।
विशेषज्ञों का कहना है कि देश के अन्य शहरों में बार-बार लेन बदलना सड़क दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और गुवाहाटी जैसे शहरों में रोजाना होने वाली कई दुर्घटनाओं की जड़ यही लापरवाही है। इससे न केवल जान का खतरा बढ़ता है, बल्कि सड़क पर तनाव और हिंसा भी जन्म लेती है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या देश के बाकी शहर आईजोल से कुछ नहीं सीख सकते? ट्रैफिक जाम में लेन कटिंग छोड़ना, हॉर्न कम बजाना और धैर्य रखना—ये छोटे-छोटे बदलाव सड़कों को कहीं अधिक सुरक्षित और शांत बना सकते हैं। आईजोल की सड़कें आज पूरे देश को यही संदेश दे रही हैं।








