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जब शब्द हुए मौन और भाव बोले — अश्वघोष की याद में जुटे देशभर के साहित्यकार

देहरादून। हिंदी साहित्य के जनवादी गीतकार और प्रख्यात ग़ज़लकार डॉ. अश्वघोष की प्रथम पुण्यतिथि के अवसर पर रविवार को ओएनजीसी ऑफिसर्स क्लब, देहरादून में एक भव्य साहित्यिक आयोजन “अश्वघोष स्मरण काव्यांजलि” संपन्न हुआ। कार्यक्रम का आयोजन उनके परिवार की ओर से किया गया, जिसकी अध्यक्षता सुप्रसिद्ध चित्रकार एवं ग़ज़लकार विज्ञान व्रत ने की, जबकि कार्यक्रम का संयोजन जाने-माने गीतकार डाॅ. बुद्धिनाथ मिश्र ने किया।

देश के विभिन्न राज्यों से आए प्रतिष्ठित साहित्यकारों और कवियों ने इस स्मरणोत्सव में भाग लेकर डॉ. अश्वघोष को भावभीनी श्रद्धांजलि दी।

स्मृतियों के दीप जले, सुरों और शब्दों से महका सभागार

कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुई। मंचासीन अतिथियों का माल्यार्पण कर स्वागत किया गया। इसके बाद डॉ. अश्वघोष के पुराने चलचित्रों और पूर्व रिकॉर्ड किए गए वीडियो प्रदर्शित किए गए, जिससे उनके जीवन की झलकियां उपस्थित लोगों के मन में ताजा हो उठीं।

डाॅ. पीयूष निगम और अरुण भट्ट ने अश्वघोष की प्रसिद्ध ग़ज़लों और गीतों का गायन कर माहौल को भावनात्मक बना दिया। वहीं उनकी सुपुत्री नमिता सिंह ने पिता को समर्पित करते हुए उनकी रचनाओं का पाठ किया, जिससे सभागार भावनाओं से भर उठा।

‘बुलंदप्रभा’ का विशेषांक विमोचन — शब्दों में अमर हुए अश्वघोष

कार्यक्रम में बुलंदशहर से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका ‘बुलंदप्रभा’ के “डाॅ. अश्वघोष श्रद्धांजलि विशेषांक” का विमोचन किया गया। यह अंक अश्वघोष के साहित्यिक योगदान और व्यक्तित्व पर केंद्रित था।

साहित्यकारों ने किया अश्वघोष के व्यक्तित्व व कृतित्व पर प्रकाश

कार्यक्रम में विज्ञान व्रत, डाॅ. बुद्धिनाथ मिश्र, डाॅ. वीरेन्द्र आजम, डाॅ. आर.पी. सारस्वत, डाॅ. इन्द्रजीत सिंह, मनोज इष्टवाल, रमेश प्रसून, डाॅ. अनूप सिंह, देवेन्द्र देव ‘मिर्जापुरी’, मुकेश निर्विकार, और इस्हाक अली ‘सुंदर’ सहित अनेक वक्ताओं ने अपने विचार रखे।

विज्ञान व्रत ने कहा— “अश्वघोष जी मूलतः जनवादी गीतकार थे। उनकी ग़ज़लों में जीवन की विसंगतियों का अद्भुत चित्रण मिलता है। वे कवियों के लिए एक प्रकाशस्तंभ की तरह हैं।”

डाॅ. बुद्धिनाथ मिश्र ने भावुक स्वर में कहा— “वे मेरे से छह वर्ष वरिष्ठ थे, लेकिन हमेशा स्नेहपूर्वक पेश आते थे। उनके गीत ‘अम्मा का खत’ और ‘अबकी हमने आम न खाए’ आज भी श्रोताओं के दिलों में गूंजते हैं। उनका लेखन हिंदी जगत की अमूल्य धरोहर है।”

डाॅ. वीरेन्द्र आजम ने उन्हें नवगीतों का पुरोधा बताते हुए कहा— “उनकी रचनाएँ सामाजिक यथार्थ से ओतप्रोत हैं। ‘अम्मा का खत’ कविता का पाठन करते हुए उन्होंने सभागार को भावविभोर कर दिया।”

डाॅ. इंद्रजीत सिंह ने उनके बाल साहित्य पर प्रकाश डालते हुए कहा— “अश्वघोष ने 50 से अधिक पुस्तकों की रचना की, जिनमें खंडकाव्य, नवगीत और कहानियाँ शामिल हैं। उनकी बाल कविता ‘बस्ता मुझसे भारी’ बच्चों के मनोविज्ञान को अद्भुत ढंग से प्रस्तुत करती है।”

“कविता उनके लिए सांस लेने का माध्यम थी”

मुकेश निर्विकार, जो विशेषांक के अतिथि संपादक रहे, ने कहा— “दद्दा अश्वघोष जन्मजात कवि थे। कविता उनके लिए केवल लेखन नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका थी। उनके भीतर कविता एक धड़कन की तरह बसती थी।”

डाॅ. अनूप सिंह ने कहा— “अश्वघोष न केवल गीतकार और ग़ज़लकार थे, बल्कि एक सशक्त कथाकार भी थे। उनकी कहानियाँ ‘अपने-अपने हाशिये’ और अन्य संग्रह सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हैं।”

मनोज इष्टवाल ने उनके साथ अपने अनुभव साझा करते हुए कहा— “अश्वघोष से मेरी पहली मुलाकात 1990 में कोटद्वार में हुई। वह हिंदी के व्याकरण और शब्दों के प्रति अत्यंत सजग रचनाकार थे। आज भी उनकी रचनाएँ नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।”

रमेश प्रसून, ‘बुलंदप्रभा’ के मुख्य संपादक ने कहा— “अश्वघोष हमेशा पत्रिका के लिए रचनाएँ भेजते थे। उनके लेखन से हमें अपार प्रेरणा मिलती रही। उनका जाना हिंदी जगत की अपूरणीय क्षति है।”

कवियों की श्रद्धांजलि और भावपूर्ण प्रस्तुति

देवेन्द्र देव ‘मिर्जापुरी’ ने छंदों के माध्यम से उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी।
इस्हाक अली ‘सुंदर’ ने कहा— “अश्वघोष ने बुलंदशहर का नाम देशभर में रौशन किया। उनकी कविताएँ पीढ़ियों तक याद रहेंगी।”

डाॅ. पीयूष निगम ने अश्वघोष की ग़ज़ल “बार-बार क्यों दोहराते हो, एक बार की भूल को” को संगीतबद्ध अंदाज़ में प्रस्तुत किया, जिसे दर्शकों ने खड़े होकर सराहा।

नमिता सिंह ने अपने पिता की याद में कविता “पापा की यादें” सुनाई — “शब्दों की उस गहराई में आज भी आपकी छाप है,” जिसने पूरे वातावरण को भावनाओं से भर दिया।

परिवार की ओर से आभार और समर्पण

अश्वघोष के सुपुत्र आशीष वशिष्ठ और राहुल वशिष्ठ ने सभी अतिथियों का स्वागत किया।
राहुल वशिष्ठ “उदघोष” ने अपने पिता पर रचित कविता “अश्वघोष” का वाचन किया, जिससे सभागार गूंज उठा।

कार्यक्रम का संचालन डाॅ. बसंती मठपाल ने कुशलता से किया।
अंत में उपस्थित साहित्य-प्रेमियों ने डॉ. अश्वघोष की रचनाओं को भारतीय साहित्य की अमिट धरोहर बताते हुए उन्हें नमन किया।

साहित्य जगत की उल्लेखनीय उपस्थिति

कार्यक्रम में डाॅ. मनोज आर्या, डॉ. मोहन भुलानी, भारती पांडे, कुसुम भट्ट, सुनील गुप्ता, हरीश सनवाल (हिमालयन लीफ), शशि मोहन (हिमांतर), अर्जुन रावत ‘तीरअंदाज’ (अतुल्य उत्तराखंड), और इंद्र सिंह नेगी (हिंदू फाउंडेशन) समेत अनेक साहित्यकार, पत्रकार और सांस्कृतिक कार्यकर्ता मौजूद रहे।

निष्कर्ष

अश्वघोष स्मरण काव्यांजलि” न केवल एक साहित्यिक कार्यक्रम था, बल्कि शब्दों और संवेदनाओं का संगम बन गया।
जहाँ एक ओर कवियों ने अपने शब्दों से दिवंगत कवि को अमर किया, वहीं दर्शकों ने यह महसूस किया कि अश्वघोष केवल कवि नहीं, बल्कि युग के साक्षी थे, जिनकी रचनाएँ हिंदी साहित्य में हमेशा जीवित रहेंगी।

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