कल्पना कीजिए एक ऐसे देश की, जहां शासन की कमान किसी अनुभवी राजनेता के बजाय एक लोकप्रिय मंचीय कवि के हाथों में हो। जहां संसद की गंभीर बहसें ‘कवि सम्मेलन’ में बदल जाएं और सरकारी फैसले फाइलों में नहीं, बल्कि तुकबंदी में लिखे जाएं। यह व्यंग्यात्मक परिदृश्य भले ही काल्पनिक हो, लेकिन अपने अंदाज में कई गहरे सवाल भी खड़े करता है।
ऐसी सरकार में कैबिनेट बैठकों का स्वरूप पूरी तरह बदल जाएगा। मंत्रियों के बीच नीतिगत चर्चा की जगह कविता पाठ होगा। प्रधानमंत्री अपने भाषणों में आंकड़ों और योजनाओं के बजाय मुक्तक सुनाएंगे और मंत्रिमंडल तालियों के साथ “वाह-वाह” करता नजर आएगा। गंभीर मुद्दों पर भी हल्के-फुल्के अंदाज में बात होगी, जिससे निर्णय प्रक्रिया का मूल स्वर ही बदल जाएगा।
विदेश नीति भी इससे अछूती नहीं रहेगी। विदेशी दौरों पर पारंपरिक कूटनीतिक वार्ताओं की जगह सांस्कृतिक प्रस्तुतियां होंगी। विश्व के बड़े नेताओं के साथ बैठकों में कविताओं का आदान-प्रदान होगा और विवादों को सुलझाने के लिए ‘रस’ और ‘छंद’ का सहारा लिया जाएगा। कल्पना यह भी है कि युद्ध जैसे गंभीर विषय भी काव्य के माध्यम से शांत किए जाने की कोशिश होगी।
सरकारी योजनाओं और बजट पेश करने का अंदाज भी अनोखा होगा। शिक्षा, रक्षा और आर्थिक नीतियों की घोषणा तुकबंदी में की जाएगी। सरकारी फाइलों में नोटिंग की जगह छंद लिखे जाएंगे, जिससे प्रशासनिक कामकाज का तरीका ही बदल जाएगा। यह बदलाव जहां एक ओर रोचक लगेगा, वहीं इसकी व्यावहारिकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस भी मनोरंजन का माध्यम बन जाएंगी। पत्रकारों के तीखे सवालों का जवाब सीधे देने के बजाय हास्य और व्यंग्य में लपेट दिया जाएगा। इससे जवाबदेही की परंपरा कमजोर पड़ सकती है और गंभीर मुद्दों पर स्पष्टता कम हो सकती है।
संसद में भी नए नियम लागू होंगे। शोर-शराबे की जगह “वाह-वाह” अनिवार्य हो जाएगी। विपक्ष का विरोध ‘दाद’ न देने तक सीमित हो सकता है। यहां तक कि मंत्रालयों के नाम और कामकाज भी काव्य शैली के अनुसार बदल जाएंगे। गृह मंत्रालय हास्य कवियों के हवाले होगा, जहां अपराधियों से पूछताछ भी मजाकिया अंदाज में की जाएगी। वित्त मंत्रालय वीर रस के प्रभाव में निर्णय लेगा, जबकि रेलवे और परिवहन विभाग श्रृंगार और गीतों से प्रभावित होंगे।
रक्षा मंत्रालय में पारंपरिक रणनीतियों के बजाय व्यंग्य और पैरोडी का इस्तेमाल कर दुश्मनों का मनोबल तोड़ने की कल्पना की गई है। यह सब सुनने में भले ही मनोरंजक लगे, लेकिन इससे शासन की गंभीरता पर प्रश्नचिह्न लगना तय है।
इस व्यंग्य का निष्कर्ष यही है कि यदि शासन केवल मनोरंजन का माध्यम बन जाए, तो वास्तविक समस्याएं पीछे छूट सकती हैं। तालियों की गूंज और तुकबंदी के बीच जनता की बुनियादी जरूरतें अनदेखी हो सकती हैं। यह लेख एक हल्के-फुल्के अंदाज में यह संदेश देता है कि प्रशासन में संतुलन, गंभीरता और जवाबदेही कितनी आवश्यक है।








