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खजूरी अकबरपुर की यात्रा में सामने आई वीरता की अनकही गाथा, भारत रत्न की उठी मांग

उत्तर प्रदेश के खजूरी अकबरपुर गांव की मिट्टी स्वतंत्रता संग्राम की अमर गाथा को अपने भीतर समेटे हुए है। यही वह भूमि है, जहां जन्मे 17 वर्षीय जगदीश प्रसाद वत्स ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अपने प्राणों की आहुति देकर देशभक्ति और साहस की मिसाल कायम की।

बताया जाता है कि उस समय वे ऋषिकुल आयुर्वेदिक कॉलेज, हरिद्वार में अध्ययनरत थे। 14 अगस्त 1942 को उन्होंने अपने साथियों का नेतृत्व करते हुए अंग्रेजी शासन के विरोध में सड़कों पर तिरंगा लेकर निकलने का साहसिक निर्णय लिया। पुलिस की मौजूदगी के बावजूद उन्होंने एक के बाद एक तीन स्थानों पर तिरंगा फहराया। इस दौरान अंग्रेज पुलिस की गोलियों से घायल होने के बाद भी वे पीछे नहीं हटे।

आखिरकार तीसरा तिरंगा फहराने के बाद उन्हें पुलिस ने घेर लिया और सीने में गोली मार दी। गंभीर रूप से घायल अवस्था में उन्हें देहरादून के सेना अस्पताल ले जाया गया, जहां कथित रूप से उन्हें जहर का इंजेक्शन देकर मार दिए जाने की बात कही जाती है। उस समय उनकी उम्र मात्र 17 वर्ष थी।

स्वतंत्रता के बाद देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उनके साहस और बलिदान को सराहा और उनके परिवार को विजय ट्रॉफी प्रदान की, जो आज भी उनकी स्मृति के रूप में सुरक्षित है।

खजूरी अकबरपुर में उनके नाम पर 1966 में स्थापित **जगदीश प्रसाद स्मारक विद्यालय** आज भी जूनियर हाई स्कूल के रूप में संचालित है, जबकि गांव में बना प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी अपेक्षित सुविधाओं से वंचित है। हरिद्वार के भल्ला पार्क और ऋषिकुल कॉलेज में उनकी प्रतिमाएं स्थापित हैं, जहां प्रतिवर्ष उनकी स्मृति में कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

शहीद के परिवार ने कभी भी सरकारी पेंशन या सहायता स्वीकार नहीं की, जो उनके स्वाभिमान और त्याग की अनूठी मिसाल है। आज आवश्यकता है कि सरकारें इस वीर सपूत के योगदान को उचित सम्मान देते हुए उनके नाम पर बने संस्थानों का उन्नयन करें और उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर वह पहचान दिलाएं, जिसके वे वास्तव में हकदार हैं।

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