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खत्म हुआ ‘मौन’: शैलजा-रावत की निर्णायक मुलाकात!

  • · शैलजा ने दौरे के दौरान कार्यकर्ताओं को दिया एकजुटता का मंत्र
  • · वार्ता के बाद रावत की सोशल मीडिया पोस्ट से मिल रहे सकारात्मक संकेत
  • · केदारनाथ उप-चुनाव और 2027 के लिए साझा चुनावी रणनीति पर भी चर्चा

-कृति सिंह, देहरादून।

उत्तराखंड की वादियों में भले ही मौसम का मिजाज सर्द हो, लेकिन कांग्रेस के भीतर सियासी तपिश अपने चरम पर है। हाल के दिनों में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का ‘मौन’ और उनके द्वारा ‘अर्जित अवकाश’ पर जाने की घोषणा ने प्रदेश की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी थी। दरअसल, यह नाराजगी सीधे तौर पर प्रदेश प्रभारी से न होकर, भाजपा के कुछ नेताओं के कांग्रेस में शामिल होने और उसके बाद खुद कांग्रेस के ही कुछ बड़े नेताओं द्वारा रावत के खिलाफ की गई बयानबाजी के कारण थी। अपने ही घर में ‘अपनों’ के वार से आहत रावत का ‘मौन’ रहना राजनीतिक गलियारों में एक गहरे असंतोष के रूप में देखा गया। इस दौरान रावत का खुद को सक्रिय राजनीति से कुछ समय के लिए दूर कर लेना दरअसल उन आंतरिक विरोधियों को एक संदेश था, जो उनके राजनीतिक कद को चुनौती देने की कोशिश कर रहे थे।

इसी सियासी हलचल के बीच 8 अप्रैल को प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा का उत्तराखंड दौरा शुरू हुआ। अपने पांच दिवसीय प्रवास के दौरान शैलजा ने गढ़वाल से लेकर कुमाऊं तक के इलाकों में पार्टी कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं के साथ संवाद किया। उनका पूरा जोर आगामी चुनाव की रणनीति तैयार करने और बिखरे हुए कुनबे को एक सूत्र में पिरोने पर रहा। शैलजा ने स्पष्ट संदेश दिया कि 2027 की राह एकजुटता से ही प्रशस्त होगी। हालांकि, दौरे के शुरुआती दिनों में हरीश रावत की अनुपस्थिति चर्चा का विषय बनी रही, लेकिन 11 अप्रैल को देहरादून के हाथीबड़कला में हुई दोनों नेताओं की मुलाकात ने अटकलों पर विराम लगा दिया। एआईसीसी की महासचिव और प्रदेश प्रभारी से मिलने के बाद रावत ने सोशल मीडिया पर पोस्ट साझा कर सकारात्मक संकेत दिए हैं।

इस मुलाकात के सियासी मायने काफी गहरे हैं। भले ही रावत की नाराजगी पार्टी के कुछ भीतरी तत्वों और भाजपा से आए नए चेहरों को लेकर रही हो, लेकिन शैलजा के साथ उनकी बैठक यह दर्शाती है कि आलाकमान उत्तराखंड में रावत के अनुभव को दरकिनार करने के पक्ष में नहीं है। कांग्रेस नेतृत्व यह भली-भांति जानता है कि केदारनाथ जैसे महत्वपूर्ण उप-चुनाव और 2027 के महासंग्राम में हरीश रावत की जमीनी पकड़ और उनके प्रभाव के बिना भाजपा के विजयी रथ को रोकना नामुमकिन है। शैलजा और रावत की इस मुलाकात ने कार्यकर्ताओं को यह भरोसा दिलाने की कोशिश की है कि शीर्ष स्तर पर सब कुछ पटरी पर लौट रहा है। रावत का सोशल मीडिया पोस्ट इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने संगठन के हित में अपने मौन को तोड़ने का फैसला किया है।

दूसरी ओर, प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल इस पूरी स्थिति को संभालने के लिए “मतभेद हो सकते हैं, मनभेद नहीं” के मंत्र पर आगे बढ़ रहे हैं। उनके लिए चुनौती यह है कि वे भाजपा से आने वाले नेताओं को भी पार्टी में जगह दें और हरीश रावत जैसे वरिष्ठ नेताओं के सम्मान को भी सुरक्षित रखें। यदि घर के भीतर का यह असंतुलन बना रहा, तो विपक्षी दल भाजपा इस फूट का लाभ उठाने में देरी नहीं करेगी। फिलहाल, शैलजा और रावत की मुलाकात ने एक अस्थायी ‘युद्धविराम’ तो कर दिया है, लेकिन असली परीक्षा आगामी चुनावों में होगी, जहाँ रणनीतियों और टिकटों के तालमेल पर सबकी नजरें टिकी होंगी। बहरहाल, उत्तराखंड कांग्रेस की यह नई हलचल दिखाती है कि पार्टी 2027 की तैयारी में गंभीर तो है, लेकिन आंतरिक सामंजस्य की डोरी अभी भी बेहद नाजुक बनी हुई है।

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