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कोलकाता में मेसी इवेंट से उठा सियासी तूफान: फुटबॉल उत्सव कैसे बन गया चुनावी हथियार?

आफरीन हुसैन

कोलकाता। कोलकाता में आयोजित विश्व फुटबॉल स्टार लियोनेल मेसी से जुड़ा कार्यक्रम, जिसे बंगाल की समृद्ध फुटबॉल संस्कृति के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया गया था, अब एक बड़े राजनीतिक विवाद का रूप ले चुका है। खेल के नाम पर शुरू हुआ यह आयोजन धीरे-धीरे प्रशासनिक अव्यवस्था, कथित अभिजात वर्गीय वर्चस्व और संदिग्ध वित्तीय प्राथमिकताओं के आरोपों के घेरे में आ गया है। 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही यह मुद्दा विपक्ष के लिए एक प्रभावी राजनीतिक हथियार बनता जा रहा है।

राजनीतिक और प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, इस आयोजन पर मेसी की उपस्थिति शुल्क, लॉजिस्टिक्स, सुरक्षा, आवास, ब्रांडिंग और प्रचार सहित कुल खर्च कई दर्जन करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। हालांकि राज्य सरकार का कहना है कि सार्वजनिक धन का सीमित उपयोग हुआ या सीधे तौर पर इसमें कोई सरकारी राशि खर्च नहीं की गई, लेकिन अब तक इस संबंध में कोई विस्तृत सार्वजनिक ऑडिट या पारदर्शी खर्च विवरण सामने नहीं आया है। यही अस्पष्टता विपक्ष के हमलों का मुख्य आधार बन गई है।

यह आयोजन राज्य के खेल विभाग की निगरानी में संपन्न हुआ, जिसकी जिम्मेदारी खेल मंत्री अरूप बिस्वास के पास है। आयोजन की व्यावहारिक व्यवस्था निजी इवेंट मैनेजमेंट कंपनियों को सौंपी गई थी, जो सरकारी एजेंसियों के साथ समन्वय में काम कर रही थीं। आलोचकों का कहना है कि इस सार्वजनिक-निजी साझेदारी ने जवाबदेही को एक धुंधले क्षेत्र में धकेल दिया, जहां अव्यवस्था के लिए न तो सरकार पूरी तरह जिम्मेदार ठहराई जा सकती है और न ही निजी आयोजक।

विवाद तब और गहरा गया, जब हजारों फुटबॉल प्रेमियों ने आरोप लगाया कि उन्होंने महंगी टिकटें खरीदने के बावजूद मुख्य कार्यक्रम तक सीमित पहुंच ही प्राप्त की। कई दर्शकों को मेसी को देखने का समय बेहद कम मिला, जबकि स्टेडियम के बड़े हिस्से लगभग औपचारिक दर्शक दीर्घा बनकर रह गए। इसके विपरीत, मंत्रियों, सत्तारूढ़ दल के नेताओं, उनके परिजनों और चुनिंदा हस्तियों को मेसी के बेहद करीब देखा गया। इन दृश्यों के सोशल मीडिया पर वायरल होते ही जनाक्रोश खुलकर सामने आ गया।

राजनीतिक असर तेजी से दिखाई देने लगा। विधानसभा में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस पूरे प्रकरण को “वीआईपी संस्कृति” और “तमाशा-आधारित शासन” का प्रतीक करार दिया। भाजपा नेताओं का आरोप है कि यह आयोजन फुटबॉल के प्रचार से अधिक सत्ता, दृश्यता और संसाधनों को मजबूत करने का माध्यम बन गया। भले ही ये आरोप अभी कानूनी प्रमाणों से दूर हों, लेकिन वे उस आम जनता में गूंज पा रहे हैं, जो पहले से ही शासन, भ्रष्टाचार और वित्तीय प्रबंधन से जुड़े विवादों से असंतुष्ट है।

इस विवाद का समय भी संदेह को और गहरा कर रहा है। 2026 के विधानसभा चुनाव अब ज्यादा दूर नहीं हैं। राज्य प्रशासन पहले से ही वित्तीय दबावों, सरकारी योजनाओं से जुड़े कर्मचारियों को भुगतान में देरी और विभिन्न मामलों में केंद्रीय एजेंसियों की जांच का सामना कर रहा है। ऐसे माहौल में एक महंगे अंतरराष्ट्रीय आयोजन ने विपक्ष को यह कहने का अवसर दे दिया कि “तमाशे के लिए पैसा है, लेकिन जरूरी जरूरतों के लिए नहीं।”

वहीं सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने भाजपा पर एक सांस्कृतिक और खेल आयोजन का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया है। पार्टी का कहना है कि मेसी जैसे वैश्विक सितारे की मौजूदगी से बंगाल की अंतरराष्ट्रीय पहचान मजबूत हुई है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय सहभागिता को राज्य को वैश्विक मंच पर स्थापित करने के अपने दृष्टिकोण का हिस्सा बताती रही हैं। हालांकि आलोचकों का तर्क है कि जब स्थानीय दर्शक खुद को उपेक्षित और अपमानित महसूस करें, तो वैश्विक ब्रांडिंग की विश्वसनीयता कमजोर पड़ जाती है।

विडंबना यह है कि “खेला होबे”, जो कभी टीएमसी का आत्मविश्वास से भरा राजनीतिक नारा था, अब विपक्ष द्वारा कथित अंदरूनी सौदों और असमान पहुंच के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। भाजपा नेता इसे इस बात का प्रमाण बता रहे हैं कि बंगाल में असली “खेल” अब विचारधारा का नहीं, बल्कि लेन-देन और विशेषाधिकारों का हो गया है।

बंगाल की राजनीति में फुटबॉल कोई तटस्थ विषय नहीं है। मोहन बागान और ईस्ट बंगाल जैसे क्लब राज्य की सांस्कृतिक पहचान से गहराई से जुड़े हैं। ऐसे में किसी वैश्विक फुटबॉल सितारे से जुड़ा आयोजन स्वाभाविक रूप से भावनात्मक महत्व रखता है। जब वही भावना निराशा और गुस्से में बदल जाती है, तो उसके राजनीतिक परिणाम दूरगामी हो सकते हैं।

चाहे मेसी से जुड़ा यह प्रकरण किसी औपचारिक जांच तक पहुंचे या नहीं, इसका राजनीतिक प्रभाव शायद उससे कहीं ज्यादा गहरा होगा। चुनावी राजनीति में अक्सर धारणा, प्रमाण से आगे निकल जाती है। विपक्ष यह सुनिश्चित करने में जुटा है कि यह विवाद न तो भुलाया जाए और न ही दबे, बल्कि सोशल मीडिया, सड़कों और चुनावी मंचों पर लगातार उठता रहे। जैसे-जैसे 2026 करीब आ रहा है, मेसी का यह आयोजन संभवतः एक खेल उत्सव के बजाय उस मोड़ के रूप में याद किया जाएगा, जब तमाशा जनभावनाओं से टकराया और एक अंतरराष्ट्रीय खेल कार्यक्रम सत्ता में बैठे लोगों के लिए स्थायी राजनीतिक बोझ बन गया।

 

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