2023 के परिसीमन के बाद यह पहला निर्णायक विधानसभा चुनाव होगा
निर्वाचन क्षेत्रों की नई सीमाओं से मुस्लिम बहुल सीटों के समीकरण पूरी तरह बदले
भाजपा परिसीमन को स्वदेशी समुदायों के हितों की रक्षा का बड़ा कवच मानती
विपक्ष ने परिसीमन को सत्ता पक्ष की ‘सांप्रदायिक गेरीमैंडरिंग’ और चुनावी साजिश बताया
ममता सिंह, गुवाहाटी/नई दिल्ली।
असम की राजनीतिक बिसात पर इस समय एक ऐसा बदलाव प्रभावी है, जो दशकों तक राज्य की चुनावी दिशा को निर्धारित करने वाला है। साल 2023 में संपन्न हुआ निर्वाचन क्षेत्रों का ‘परिसीमन’ इस बार के विधानसभा चुनाव का सबसे बड़ा और निर्णायक फैक्टर बनकर उभरा है। 1976 के बाद पहली बार हुई इस कवायद ने असम के चुनावी मानचित्र को पूरी तरह बदल दिया है। हालांकि, विधानसभा की कुल 126 और लोकसभा की 14 सीटों की संख्या में कोई बदलाव नहीं हुआ, लेकिन उनकी भौगोलिक सीमाओं और जनसांख्यिकीय संरचना में जो फेरबदल हुआ है, उसने राजनीतिक दलों की रातों की नींद उड़ा दी है।
इस परिसीमन का सबसे गहरा असर उन सीटों पर पड़ा है जिन्हें पारंपरिक रूप से अल्पसंख्यक या मुस्लिम बहुल माना जाता था! निर्वाचन आयोग द्वारा जारी अंतिम रिपोर्ट और राजनीतिक विश्लेषकों के आंकड़ों के अनुसार, मुस्लिम मतदाताओं के प्रभाव वाली सीटों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आई है। पहले जहां लगभग 29 सीटों पर अल्पसंख्यक मतदाता निर्णायक भूमिका में थे, वहीं नई सीमाओं के निर्धारण के बाद यह संख्या घटकर 22 के करीब रह गई है। इसके उलट, ‘स्वदेशी’ समुदायों के वर्चस्व वाली सीटों का दायरा बढ़ गया है। भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दल इसे अपनी सबसे बड़ी रणनीतिक जीत मान रहे हैं। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि इस परिसीमन से असमिया मूल के लोगों का राजनीतिक भविष्य अगले दो दशकों के लिए सुरक्षित हो गया है। सत्ता पक्ष का तर्क है कि यह प्रक्रिया ‘असम समझौते’ की मूल भावना के अनुरूप है, जो स्वदेशी लोगों को संवैधानिक सुरक्षा कवच प्रदान करने की बात करता है।
दूसरी ओर, विपक्षी खेमा विशेषकर कांग्रेस और एआईयूडीएफ इस पूरी प्रक्रिया को संदेह की दृष्टि से देख रहे हैं। विपक्ष का सीधा आरोप है कि यह परिसीमन प्रशासनिक सुविधा के बजाय राजनीतिक लाभ के लिए किया गया है। वे इसे ‘सांप्रदायिक गेरीमैंडरिंग’ का नाम दे रहे हैं यानी चुनावी सीमाओं को इस तरह से खींचना जिससे एक विशेष समुदाय की वोटिंग शक्ति को खंडित या कम किया जा सके। विपक्ष का दावा है कि कई ऐसी सीटों को अनुसूचित जाति (एससी) या अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित कर दिया गया है, जहां मुस्लिम आबादी अधिक थी, जिससे वहां के अल्पसंख्यक नेतृत्व की संभावनाओं को धक्का लगा है। इसके अलावा, कई मजबूत अल्पसंख्यक बस्तियों को अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में बांट दिया गया है ताकि उनका सामूहिक प्रभाव कम हो सके।
निर्वाचन आयोग ने हालांकि स्पष्ट किया है कि यह अभ्यास 2001 की जनगणना के आधार पर पूरी पारदर्शिता के साथ किया गया है, जिसमें भौगोलिक निरंतरता, प्रशासनिक इकाइयों की अखंडता और जनसुविधा का ध्यान रखा गया है। अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 16 से बढ़ाकर 19 और अनुसूचित जातियों के लिए 8 से बढ़ाकर 9 करना भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन जमीन पर यह केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि एक गहरे सामाजिक-राजनीतिक ध्रुवीकरण का जरिया बन गया है। भाजपा इस मुद्दे को ‘असमिया अस्मिता की रक्षा’ के नैरेटिव से जोड़कर पेश कर रही है, जिससे उसे ऊपरी असम और स्वदेशी समुदायों के बीच अपनी पैठ और मजबूत करने की उम्मीद है।
जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, यह परिसीमन उम्मीदवारों के चयन से लेकर प्रचार के मुद्दों तक को प्रभावित कर रहा है। कई कद्दावर नेताओं के पारंपरिक क्षेत्र अब या तो गायब हो गए हैं या उनका स्वरूप इतना बदल गया है कि उन्हें नए सुरक्षित ठिकानों की तलाश करनी पड़ रही है। ‘असोम सन्मिलित मोर्चा’ (एएसएम) जैसे विपक्षी गठबंधन के लिए चुनौती यह है कि वे बदले हुए भूगोल में अपने पुराने वोट बैंक को कैसे एकजुट रखें। वहीं, सत्तारूढ़ दल के लिए चुनौती यह साबित करने की होगी कि यह बदलाव केवल कागजी सीमाओं का नहीं, बल्कि समावेशी विकास और सांस्कृतिक संरक्षण का भी हिस्सा है।
अगले सप्ताह जब यह चुनावी चर्चा और तेज होगी, तब असम के मतदाता इस नई व्यवस्था के तहत पहली बार अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। यह चुनाव केवल यह तय नहीं करेगा कि सत्ता की चाबी किसके पास होगी, बल्कि यह भी स्पष्ट कर देगा कि 2023 के परिसीमन ने असम की राजनीति में जिस ‘नये सामान्य’ को जन्म दिया है, उसे जनता का कितना समर्थन प्राप्त है। निश्चित रूप से, परिसीमन के बाद का यह पहला चुनाव असम के राजनीतिक इतिहास में एक नए युग की शुरुआत के रूप में दर्ज होने जा रहा है।








