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नंदा गौरा छात्रवृत्ति से बढ़ा नामांकन, लेकिन क्यों बीच में पढ़ाई छोड़ रहीं छात्राएं?

देहरादून। उत्तराखंड सरकार द्वारा उच्च शिक्षा में बालिकाओं की भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू की गई नंदा गौरा योजना छात्रवृत्ति ने पहले ही वर्ष में उत्साहजनक परिणाम दिखाए। इस योजना के तहत 12वीं के बाद कॉलेज या विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने वाली छात्राओं को एकमुश्त 51 हजार रुपये की सहायता राशि दी जाती है। योजना का मकसद था कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की बेटियां बिना किसी बाधा के स्नातक स्तर तक पढ़ाई पूरी कर सकें।

लेकिन अब इस योजना से जुड़ा एक चिंताजनक ट्रेंड सामने आ रहा है। छात्रवृत्ति की राशि मिलने के बाद बड़ी संख्या में छात्राएं पढ़ाई बीच में ही छोड़ रही हैं। यह स्थिति सरकार, शिक्षाविदों और समाज सभी के लिए गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है।

उच्च शिक्षा में बढ़ता नामांकन, पर टिकाव की कमी

भारत सरकार ने वर्ष 2035 तक 17 से 23 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं में 50 प्रतिशत उच्च शिक्षा नामांकन (GER) का लक्ष्य रखा है। उत्तराखंड इस दिशा में पहले ही काफी आगे निकल चुका है।
ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (AISHE) 2021-22 की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में इस आयु वर्ग के 40 प्रतिशत से अधिक युवा किसी न किसी उच्च शिक्षा संस्थान में नामांकित हैं। इनमें लड़कियों की भागीदारी लगभग बराबर है।
अनुमान है कि शैक्षणिक सत्र 2025-26 तक यह आंकड़ा 45 प्रतिशत से भी अधिक हो जाएगा।

इस वृद्धि में नंदा गौरा योजना की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। खासतौर पर ग्रामीण और मैदानी क्षेत्रों में बीए, बीएससी और बीकॉम जैसे सामान्य डिग्री पाठ्यक्रमों में छात्राओं का पंजीकरण तेज़ी से बढ़ा है।

समस्या कहां पैदा हो रही है?

समस्या नामांकन की नहीं, बल्कि ड्रॉपआउट की है। आंकड़े बताते हैं कि स्नातक प्रथम वर्ष के बाद ही बड़ी संख्या में छात्राएं पढ़ाई छोड़ देती हैं। कई कॉलेजों में यह संख्या 25 प्रतिशत से अधिक पाई गई है, जबकि कुछ क्षेत्रों और अल्पसंख्यक समूहों में स्थिति और भी गंभीर है।

शिक्षाविदों का मानना है कि इसके पीछे सबसे बड़ी वजह 51 हजार रुपये की एकमुश्त छात्रवृत्ति है।
गरीब परिवारों में यह राशि अक्सर छात्रा की पढ़ाई पर खर्च होने के बजाय परिवार की अन्य आवश्यकताओं में लग जाती है। कई मामलों में अभिभावक प्रवेश दिलाते समय ही कॉलेजों में यह पूछते नजर आते हैं कि नंदा गौरा योजना की राशि कब तक खाते में आएगी।

योजना का उद्देश्य था कि यह धनराशि तीन या चार वर्षों की डिग्री अवधि में किताबों, अध्ययन सामग्री, यात्रा व्यय और अन्य शैक्षणिक जरूरतों में काम आए। लेकिन व्यवहार में यह राशि कई परिवारों के लिए अतिरिक्त आय बनकर रह गई है।

छात्राओं की मजबूरी

कई छात्राएं ऐसी पारिवारिक परिस्थितियों में होती हैं, जहां वे यह कहने की स्थिति में नहीं होतीं कि यह पैसा केवल उनकी पढ़ाई के लिए है। नतीजतन, राशि मिलने के बाद पढ़ाई जारी रखने की प्राथमिकता खत्म हो जाती है और अगले सत्र में वे कॉलेज नहीं लौटतीं।

समाधान क्या हो सकता है?

विशेषज्ञों का मानना है कि योजना को पूरी तरह खत्म करने के बजाय इसके क्रियान्वयन में सुधार की आवश्यकता है।

1. किस्तों में भुगतान का सुझाव
सबसे व्यावहारिक सुझाव यह है कि 51 हजार रुपये की राशि एक साथ न देकर तीन किस्तों में दी जाए—

  • प्रवेश के समय: ₹17,000
  • प्रथम वर्ष उत्तीर्ण करने पर: ₹17,000
  • द्वितीय वर्ष उत्तीर्ण कर तृतीय वर्ष में प्रवेश पर: ₹17,000

यदि कोई छात्रा राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम पूरा करना चाहती है, तो चौथे वर्ष में अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि भी दी जा सकती है।

2. बायोमेट्रिक उपस्थिति से जोड़ना
दूसरा अहम उपाय यह है कि नंदा गौरा योजना के अंतर्गत चयनित छात्राओं के लिए बायोमेट्रिक उपस्थिति अनिवार्य की जाए।
सरकार पहले ही न्यूनतम 180 दिन की उपस्थिति का मानक तय कर चुकी है। ऐसे में प्रति बायोमेट्रिक उपस्थिति 100 रुपये का प्रोत्साहन तय किया जा सकता है।
शैक्षणिक वर्ष के अंत में जिन छात्राओं की उपस्थिति 180 दिन या उससे अधिक हो, उन्हें उसी अनुपात में छात्रवृत्ति राशि जारी की जाए।

इससे दो बड़े फायदे होंगे—

  • कक्षाओं में उपस्थिति बढ़ेगी
  • ड्रॉपआउट की संभावना कम होगी

हालांकि इससे कॉलेजों और विश्वविद्यालयों पर प्रशासनिक काम थोड़ा बढ़ेगा, लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणाम सकारात्मक होंगे।

3. मेधावी छात्राओं को अतिरिक्त प्रोत्साहन
योजना को शिक्षा की गुणवत्ता से जोड़ने के लिए यह प्रस्ताव भी दिया जा रहा है कि जो छात्राएं 75 प्रतिशत या उससे अधिक अंक प्राप्त करें, उन्हें अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि दी जाए।
इससे छात्राओं में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और पढ़ाई की गुणवत्ता में सुधार होगा।

योजना का असली लक्ष्य क्या हो?

विशेषज्ञों का मानना है कि नंदा गौरा योजना का लक्ष्य केवल 12वीं के बाद कॉलेज में प्रवेश कराना नहीं होना चाहिए, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि छात्राएं अपनी स्नातक उपाधि पूरी करें
इसके साथ ही योजना का विस्तार स्नातकोत्तर स्तर तक भी किया जाना चाहिए, क्योंकि नई शिक्षा नीति में 12वीं के बाद पांच वर्षों तक निरंतर अध्ययन की स्पष्ट व्यवस्था दी गई है।

गुणात्मक शिक्षा की जरूरत

वर्तमान में उत्तराखंड संख्यात्मक लक्ष्य (GER) को समय से पहले हासिल करने की ओर बढ़ रहा है। अब जरूरत है गुणात्मक उपलब्धि (QER) पर ध्यान देने की।
यदि छात्रवृत्ति वितरण प्रणाली में कुछ बदलाव से सरकार का व्यय थोड़ा बढ़ भी जाए, तो भी इसके परिणाम दूरगामी और सकारात्मक होंगे।

निष्कर्ष

नंदा गौरा योजना अपने उद्देश्य में सही है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में सुधार की सख्त जरूरत है। यदि यह योजना शिक्षा की निरंतरता, उपस्थिति और गुणवत्ता से जुड़ती है, तो यह केवल एक आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि उत्तराखंड में महिला शिक्षा की रीढ़ बन सकती है।

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