नई दिल्ली। भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सोमवार शाम को स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अपने पद से तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को लिखे अपने त्यागपत्र में कहा कि वह संविधान के अनुच्छेद 67(ए) के तहत यह निर्णय ले रहे हैं। धनखड़ ने कहा कि यह कदम उन्होंने चिकित्सकीय सलाह और स्वास्थ्य देखभाल को प्राथमिकता देने के कारण उठाया है।
74 वर्षीय धनखड़ ने अगस्त 2022 में उपराष्ट्रपति का पदभार संभाला था और उनका कार्यकाल अगस्त 2027 तक निर्धारित था। उपराष्ट्रपति होने के साथ‑साथ वे राज्यसभा के सभापति भी थे। लेकिन संसद के मानसून सत्र के पहले दिन ही उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया, जिससे राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई।
हाल में कराई गई एंजियोप्लास्टी
धनखड़ हाल ही में दिल्ली स्थित एम्स (AIIMS) में एक सफल एंजियोप्लास्टी से गुज़रे थे। स्वास्थ्य को लेकर बढ़ती चिंताओं और डॉक्टरों की सलाह के मद्देनज़र उन्होंने यह कठिन निर्णय लिया। इस्तीफे के साथ उन्होंने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद और सांसदों को उनके कार्यकाल में मिले सहयोग के लिए धन्यवाद भी दिया।
उन्होंने अपने पत्र में लिखा,
“स्वास्थ्य देखभाल को प्राथमिकता देने और चिकित्सीय सलाह का पालन करने के लिए, मैं संविधान के अनुच्छेद 67(ए) के अनुसार, तत्काल प्रभाव से भारत के उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा देता हूं।”
विपक्ष से टकराव और महाभियोग प्रस्ताव
धनखड़ का कार्यकाल शांतिपूर्ण नहीं रहा। बतौर राज्यसभा सभापति, उनका विपक्ष से कई मुद्दों पर टकराव हुआ। संसद में नियमों की सख्ती से अनुपालना कराने की उनकी शैली को लेकर विपक्ष ने कई बार असहमति जताई। इसी क्रम में उनके विरुद्ध महाभियोग चलाने का प्रस्ताव भी लाया गया था — स्वतंत्र भारत में किसी मौजूदा उपराष्ट्रपति के खिलाफ यह पहला मामला था।
हालाँकि, यह प्रस्ताव बाद में राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश द्वारा खारिज कर दिया गया। धनखड़ ने संसद संचालन में जिस तरह की सक्रिय भूमिका निभाई, उसने उन्हें एक प्रभावशाली लेकिन विवादास्पद सभापति बना दिया।
इस्तीफे से ठीक पहले न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा का मामला
धनखड़ का इस्तीफा ऐसे समय पर आया है जब विपक्ष ने न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को हटाने का एक प्रस्ताव राज्यसभा में प्रस्तुत किया था। उपराष्ट्रपति ने उस प्रस्ताव का सदन में उल्लेख किया था। इस घटनाक्रम को राजनीतिक हलकों में एक संभावित तनावपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा था।
इसी तरह का एक प्रस्ताव लोकसभा में भी लाया गया था, जिसे विपक्ष और सत्तारूढ़ दल दोनों ने समर्थन दिया था। ऐसे समय में उपराष्ट्रपति का पद छोड़ना न केवल अप्रत्याशित है, बल्कि सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए एक रणनीतिक झटका भी माना जा रहा है।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण
धनखड़ भारत के दूसरे ऐसे उपराष्ट्रपति बन गए हैं, जिन्होंने कार्यकाल पूरा होने से पहले इस्तीफा दिया हो। उनसे पहले वी. वी. गिरि ने 20 जुलाई, 1969 को राष्ट्रपति चुनाव में स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर भाग लेने के लिए उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दिया था।
भावनात्मक विदाई
अपने पत्र में धनखड़ ने लिखा,
“मैं भारत के राष्ट्रपति के प्रति गहरी कृतज्ञता प्रकट करता हूं, जिनका समर्थन अडिग रहा। प्रधानमंत्री का सहयोग और समर्थन अमूल्य रहा है और मैंने अपने कार्यकाल के दौरान उनसे बहुत कुछ सीखा है। सभी सांसदों से जो विश्वास और स्नेह मिला है, वह मेरी स्मृति में सदैव रहेगा।”
आगे की राह
अब सवाल यह उठता है कि जब तक नया उपराष्ट्रपति चुना नहीं जाता, राज्यसभा का संचालन कौन करेगा? ऐसे मामलों में नियमों के अनुसार, राज्यसभा के उपसभापति (वर्तमान में हरिवंश नारायण सिंह) कार्यवाहक सभापति के तौर पर सदन का संचालन करते हैं।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 68 के तहत, उपराष्ट्रपति के पद रिक्त होने की स्थिति में छह महीने के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य है। नए उपराष्ट्रपति का कार्यकाल पांच वर्ष का होगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धनखड़ का इस्तीफा आने वाले महीनों में संसदीय राजनीति और सत्ता संतुलन पर असर डाल सकता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन अब नए उम्मीदवार के रूप में किसे आगे लाता है और विपक्ष उसका कैसे जवाब देता है।








