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लावारिसों की वारिस शालू सैनी: जहां तिरस्कृत बुजुर्गों को मिला अपनापन और नई जिंदगी

रुड़की/मुजफ्फरनगर। आज के दौर में, जब बुजुर्ग माता-पिता को बोझ समझकर घर से बाहर कर दिया जाता है, उसी समाज में अगर कोई उन्हें गले लगाकर यह कहे कि *“आप अकेले नहीं हैं”*, तो वह सिर्फ समाजसेवी नहीं, बल्कि इंसानियत की जीवित मिसाल होती है। ऐसी ही मिसाल हैं **क्रांतिकारी शालू सैनी**, जिन्हें आज देश-प्रदेश में *“लावारिसों की वारिस”* के नाम से जाना जाता है।

शहर के दक्षिणी कृष्णापुरी क्षेत्र में उस समय भावुक दृश्य देखने को मिला, जब अपनों द्वारा ठुकराए गए बुजुर्गों के लिए बने **वृद्धा आश्रम** का उद्घाटन किया गया। इस आश्रम का उद्घाटन नगर पालिका अध्यक्ष **मीनाक्षी स्वरूप एडवोकेट**, **राकेश सैनी** और समाजसेवी **मास्टर विजय सिंह** ने संयुक्त रूप से फीता काटकर किया। यह सिर्फ एक भवन का उद्घाटन नहीं था, बल्कि टूटे हुए बुजुर्ग दिलों के लिए उम्मीद का नया द्वार था।

कोरोना महामारी के भयावह दौर में, जब लोग अपनों से दूरी बना रहे थे, तब शालू सैनी ने उन शवों को कंधा दिया जिन्हें दुनिया ने लावारिस कहकर छोड़ दिया था। उन्होंने न सिर्फ अंतिम संस्कार किया, बल्कि उन्हें नाम और सम्मान भी दिया। वही हाथ, जो कभी शमशान में लावारिसों को विदाई देते थे, आज अपनों द्वारा छोड़े गए बुजुर्गों का सिर सहलाकर बेटी का अपनापन दे रहे हैं।

नवउद्घाटित वृद्धा आश्रम उन बुजुर्ग पुरुषों और महिलाओं के लिए आशा की किरण है, जिन्होंने अपने ही घरों में अपमान, तिरस्कार और अकेलापन झेला। यहां उन्हें सिर्फ छत ही नहीं, बल्कि **सम्मान, स्नेह, भोजन, इलाज और परिवार जैसा वातावरण** मिलेगा। उद्घाटन के दौरान कई बुजुर्गों की आंखों से आंसू छलक पड़े और किसी ने भावुक होकर कहा— *“बेटी हो तो शालू जैसी।”*

नगर पालिका अध्यक्ष मीनाक्षी स्वरूप ने कहा कि शालू सैनी आज के समाज के लिए प्रेरणा हैं। समाजसेवी मास्टर विजय सिंह ने इसे समाज सेवा नहीं, बल्कि तपस्या बताया। कार्यक्रम में मौजूद जनता और विशिष्टजनों ने शालू सैनी की निस्वार्थ सेवा को सलाम किया।

आज शालू सैनी सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि भरोसा हैं—
**लावारिसों की वारिस, बुजुर्गों की बेटी और इंसानियत की आख़िरी उम्मीद।**

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