अयोध्या में तैनात जीएसटी के डिप्टी कमिश्नर **प्रशांत कुमार सिंह** द्वारा सार्वजनिक रूप से इस्तीफा देने की घोषणा के बाद प्रशासनिक गलियारों में असमंजस की स्थिति बन गई है। हैरानी की बात यह है कि अब तक न तो उत्तर प्रदेश शासन को उनका कोई लिखित इस्तीफा प्राप्त हुआ है और न ही राज्य कर आयुक्त कार्यालय में इसकी आधिकारिक पुष्टि हो सकी है।
विभागीय सूत्रों के अनुसार, जब तक विधिवत लिखित रूप में त्यागपत्र प्राप्त नहीं होता, तब तक किसी भी प्रशासनिक या अनुशासनात्मक कार्रवाई पर निर्णय संभव नहीं है। ऐसे में सार्वजनिक मंच से किया गया इस्तीफे का ऐलान महज एक बयान माना जा रहा है, न कि औपचारिक प्रक्रिया का हिस्सा।
गौरतलब है कि प्रशांत कुमार सिंह ने हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समर्थन में भावनात्मक बयान देते हुए अपने पद से इस्तीफा देने की घोषणा की थी। इस कदम ने प्रशासनिक के साथ-साथ राजनीतिक हलकों में भी हलचल मचा दी थी। हालांकि, उसी दिन देर रात उनके सगे भाई **डॉ. विश्वजीत सिंह** ने उन पर फर्जी दिव्यांग प्रमाणपत्र के जरिए सरकारी नौकरी हासिल करने का गंभीर आरोप लगाकर मामले को नया मोड़ दे दिया।
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए उत्तर प्रदेश शासन ने राज्य कर आयुक्त से प्रशांत कुमार सिंह से संबंधित विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। शासन ने निर्देश दिए हैं कि रिपोर्ट में उनके खिलाफ लंबित जांच, जारी नोटिस, अब तक की गई कार्रवाई और संभावित विभागीय कदमों का पूरा ब्यौरा शामिल किया जाए। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट करने को कहा गया है कि इस्तीफे की घोषणा किन परिस्थितियों में की गई और क्या इसका संबंध चल रही जांच से है।
डॉ. विश्वजीत सिंह का दावा है कि उन्होंने 20 अगस्त 2021 को इस संबंध में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद मेडिकल बोर्ड द्वारा दो बार जांच के लिए बुलाए जाने के बावजूद प्रशांत कुमार सिंह के पेश न होने पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। अब शासन स्तर पर चिकित्सा अधिकारियों से अब तक की गई कार्रवाई की रिपोर्ट भी मांगी गई है।
प्रशांत कुमार सिंह की राजनीतिक पृष्ठभूमि भी इस पूरे प्रकरण को और जटिल बना रही है। वे पहले अमर सिंह की पार्टी ‘लोकमंच’ से जुड़े रहे हैं और बाद में पीसीएस परीक्षा के जरिए सेवा में आए। हाल के दिनों में उनके राजनीतिक दावे और पोस्टरबाजी ने भी विवाद को और हवा दी है।
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