कांकेर। नागरिक अधिकार रक्षा मंच ने केंद्र सरकार द्वारा जीएसटी दरों में की गई कमी को लेकर बड़ा बयान दिया है। मंच के संयोजक सुखरंजन नंदी और उप संयोजक नजीब कुरैशी ने कहा कि जीएसटी वस्तुओं की कीमत पर लागू होने वाला टैक्स है, वस्तुओं की कीमत खुद नहीं तय करता। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि अगर किसी वस्तु की कीमत 100 रुपए है और उस पर 5 प्रतिशत जीएसटी है, तो ग्राहक को 105 रुपए देने होंगे। इसी तरह, 50 रुपए कीमत वाली वस्तु पर 5 प्रतिशत टैक्स होने से ग्राहक को 52.50 रुपए ही चुकाने होंगे।
नेताओं ने कहा कि महंगाई पर अंकुश लगाए बिना जीएसटी दर कम करना जनता को राहत देने का दावा केवल भ्रम है। जीवनरक्षक दवाओं की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। सरकार ने जीएसटी कम कर दी है, लेकिन इससे जनता को वास्तविक राहत नहीं मिली। असल में दवाइयों की कीमत बढ़ाने में कंपनियों के मुनाफे की भूमिका है, न कि केवल टैक्स।
मंच ने पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों का उदाहरण भी दिया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग राज्यों में भिन्न-भिन्न दरों के कारण पेट्रोल-डीजल महंगे हैं, जबकि अगर उन पर जीएसटी लगाया जाता, तो कीमतें नियंत्रित हो सकती थीं। साथ ही, बिजली के निजीकरण और उसकी महंगी दरों से वस्तुओं की उत्पादन लागत बढ़ रही है, जिससे महंगाई बढ़ती है और जनता पर बोझ पड़ता है।
नेताओं ने कहा कि जीएसटी को दो स्लैब में लाना लंबे समय से जनता की मांग थी, और सरकार केवल राजनीतिक प्रचार के लिए इसे लागू कर रही है। उन्होंने जोर दिया कि देश की आम जनता की क्रयशक्ति बढ़ाने के लिए रोजगार सृजन, मनरेगा जैसे कार्यक्रमों में निवेश और आय बढ़ाने वाली नीतियों की जरूरत है। केवल टैक्स कम करने से वस्तुओं की मांग नहीं बढ़ेगी और जनता को वास्तविक राहत नहीं मिलेगी।
अंत में मंच ने सरकार पर आरोप लगाया कि जीएसटी दरों में मामूली बदलाव को जनता के लिए खुशहाली का प्रचार देना केवल राजनीतिक स्वार्थ साधने की कोशिश है, जबकि असली मकसद आम जनता को राहत देना नहीं है।








