अब तक दवाओं के परीक्षण के लिए चूहा, खरगोश और बंदर जैसे जीवों का इस्तेमाल होता रहा है, लेकिन अब इस सूची में **जेब्राफिश** भी शामिल हो गई है। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक देश में पहली बार जयपुर स्थित **राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान** ने आयुर्वेदिक दवाओं के परीक्षण के लिए आधुनिक प्रयोगशाला स्थापित कर जेब्राफिश पर प्री-क्लिनिकल ट्रायल की शुरुआत की है। आयुर्वेद जगत में इसे एक अहम और ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।
आयुर्वेदिक विशेषज्ञों का कहना है कि इस पहल से रिसर्च की गति और सटीकता दोनों में इजाफा होगा। आयुर्वेद हजारों वर्षों के अनुभव और परंपरागत ज्ञान पर आधारित है, लेकिन वैश्विक स्तर पर इसकी स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए ठोस वैज्ञानिक आंकड़ों की जरूरत होती है। इसी उद्देश्य से अब आयुर्वेदिक दवाओं को आधुनिक रिसर्च पद्धतियों के जरिए परखा जा रहा है।
जेब्राफिश, जिसका वैज्ञानिक नाम **डैनियो रेरियो** है, एक छोटी मीठे पानी की मछली होती है, जिसकी लंबाई करीब दो इंच तक होती है। आयुर्वेदिक दवाओं के प्री-क्लिनिकल ट्रायल के लिए इसे चुने जाने के पीछे कई वैज्ञानिक कारण हैं। इंसान और जेब्राफिश के जीन करीब 70 प्रतिशत तक समान पाए गए हैं, जिससे दवाओं के प्रभाव को समझना आसान हो जाता है।
इसके अलावा जेब्राफिश के भ्रूण पारदर्शी होते हैं, जिससे माइक्रोस्कोप के जरिए यह देखा जा सकता है कि कोई दवा हृदय, मस्तिष्क या अन्य अंगों पर किस तरह असर डाल रही है। जेब्राफिश का विकास भी बेहद तेज होता है। इसके अंग 24 से 48 घंटों के भीतर विकसित होने लगते हैं और यह एक साथ 100 से ज्यादा अंडे देती है।
अन्य जीवों की तुलना में जेब्राफिश पर परीक्षण कम समय में पूरा हो जाता है और इसका रख-रखाव भी काफी सस्ता होता है। कम जगह में बड़ी संख्या में इन्हें पाला जा सकता है, जिससे रिसर्च प्रक्रिया आसान और किफायती बनती है।
राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान के रस शास्त्र विभाग के एचओडी **डॉ. अनुपम श्रीवास्तव** ने बताया कि जेब्राफिश मॉडल बायोमेडिकल रिसर्च का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इससे मिलने वाला डेटा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयुर्वेदिक दवाओं की वैज्ञानिक समझ और स्वीकार्यता को बढ़ाने में मदद करेगा। उन्होंने दावा किया कि आयुर्वेद क्षेत्र में देशभर में यह पहल सबसे पहले जयपुर में शुरू की गई है और आने वाले समय में अन्य संस्थानों में भी इसे अपनाया जाएगा।








