---Advertisement---

नैनीताल हाई कोर्ट ने यौन उत्पीड़न व पॉक्सो एक्ट के दोषी को आंशिक राहत दी, लेकिन छेड़छाड़ और पीछा करने का दोष सिद्ध

नैनीताल: उत्तराखंड हाई कोर्ट ने यौन उत्पीड़न और पॉक्सो एक्ट में निचली अदालत द्वारा दोषसिद्ध अभियुक्त उजैब की सजा में आंशिक संशोधन करते हुए उसे यौन उत्पीड़न और पॉक्सो एक्ट की गंभीर धाराओं से दोषमुक्त करार दिया है। हालांकि, उसे बालिकाओं का पीछा करने और छेड़छाड़ करने के आरोपों में दोषी माना है और सजा सुनाई है। यह फैसला न्यायमूर्ति रवीन्द्र मैठाणी की एकलपीठ ने सुनाया।

मामला विशेष सत्र न्यायालय से संबंधित था, जिसमें 15 जनवरी 2025 को अभियुक्त उजैब को धारा 354 आईपीसी और पॉक्सो एक्ट के तहत दोषी करार दिया गया था। कोर्ट ने उसे चार साल के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी। अभियोजन पक्ष का कहना था कि अभियुक्त ने दो छात्राओं का लगातार पीछा किया था और 14 फरवरी 2023 को जब वे स्कूल से लौट रही थीं, तो उसने एक पीड़िता से छेड़छाड़ करने का प्रयास किया। पीड़िताओं के शोर मचाने के बाद स्थानीय लोगों ने अभियुक्त को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया था। प्राथमिकी पीड़िताओं की माता द्वारा दर्ज कराई गई थी।

हाई कोर्ट का निर्णय

हाई कोर्ट ने इस मामले में अपने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद दोनों पीड़िताओं के बयान स्वाभाविक और विश्वसनीय हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि अभियुक्त ने बार-बार उनका पीछा किया, जबकि उसे ऐसा न करने की चेतावनी दी गई थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि पीड़िताओं ने किसी भी प्रकार की शारीरिक छेड़छाड़ या बल प्रयोग का उल्लेख नहीं किया, और इस आधार पर न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि स्त्री की लज्जा भंग करने हेतु हमला और बल प्रयोग की शर्तें पूरी नहीं होतीं।

इसके बावजूद, हाई कोर्ट ने आईपीसी की स्टॉकिंग संबंधी और पॉक्सो एक्ट की यौन उत्पीड़न संबंधी धाराओं के तहत अभियुक्त को दोषी ठहराया। कोर्ट ने अभियुक्त को पहले से जेल में बिताई गई अवधि को सजा मानते हुए 10 हजार रुपये जुर्माना लगाया। जुर्माने का भुगतान न करने की स्थिति में अभियुक्त को एक माह का साधारण कारावास भुगतना होगा।

कोर्ट की व्याख्या

हाई कोर्ट के अनुसार, अभियुक्त द्वारा पीड़िताओं का बार-बार पीछा करना और उनका मानसिक उत्पीड़न करना गंभीर अपराध है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि पीड़िताओं ने शारीरिक उत्पीड़न का आरोप नहीं लगाया, फिर भी उनके द्वारा सामना की गई मानसिक परेशानियों और डर को नकारा नहीं जा सकता। स्टॉकिंग और यौन उत्पीड़न की धाराओं के तहत अभियुक्त की दंडितता को उचित ठहराया गया।

हाई कोर्ट के इस आदेश में एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कोर्ट ने शारीरिक उत्पीड़न के आरोपों पर विचार करते हुए पॉक्सो एक्ट की गंभीर धाराओं को लागू नहीं किया, क्योंकि पीड़िताओं द्वारा बल प्रयोग और शारीरिक छेड़छाड़ का उल्लेख नहीं किया गया था। हालांकि, यह आदेश यह संकेत देता है कि यौन उत्पीड़न और स्टॉकिंग की घटनाओं को हल्के में नहीं लिया जाएगा, और ऐसे मामलों में सजा को सख्ती से लागू किया जाएगा।

समाज में इस फैसले का प्रभाव

यह फैसला समाज में यौन उत्पीड़न, पीछा करने और छेड़छाड़ के मामलों को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश भेजता है। अदालत ने जहां एक ओर अभियुक्त को कुछ आरोपों में दोषी ठहराया, वहीं दूसरी ओर यह भी दिखाया कि शारीरिक उत्पीड़न के मामलों में केवल आरोपों के आधार पर गंभीर धाराओं को लागू नहीं किया जा सकता, जब तक कि पीड़ितों के बयान में पूरी साक्ष्य न हो।

यह निर्णय उन मामलों के लिए एक मिसाल बन सकता है, जहां यौन उत्पीड़न और पीछा करने के आरोप तो होते हैं, लेकिन शारीरिक उत्पीड़न के स्पष्ट साक्ष्य नहीं होते। ऐसे मामलों में अदालतें मानसिक उत्पीड़न और पीड़ितों के भय को भी ध्यान में रखकर निर्णय लेंगी, और सजा का निर्धारण साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा।

नैनीताल हाई कोर्ट का यह निर्णय यह भी दर्शाता है कि न्याय व्यवस्था पीड़ितों की मानसिक स्थिति और उन्हें हुई कठिनाइयों को समझने का प्रयास करती है, और इसके अनुसार सजा का निर्धारण करती है।

Related Post