भूख लगते ही मोमोज, चाऊमीन, पिज्जा और बर्गर जैसे फास्ट फूड विकल्प आज हर गली-मोहल्ले में आसानी से मिल जाते हैं। स्वाद और सुविधा के कारण लोग इन्हें तुरंत चुन लेते हैं, लेकिन सेहत के लिहाज से यह आदत गंभीर खतरे पैदा कर रही है। हाल ही में चेन्नई के कई इलाकों में की गई एक रिसर्च में सामने आया है कि जहां फास्ट फूड की दुकानें घर के पास होती हैं, वहां रहने वाले लोगों में टाइप-2 डायबिटीज और मोटापे का जोखिम तेजी से बढ़ रहा है।
इस ताजा अध्ययन के मुताबिक जिन घरों के करीब 400 मीटर के दायरे में मोमोज और चाऊमीन जैसे फास्ट फूड स्टॉल मौजूद हैं, वहां रहने वाले लोग बाहर का खाना ज्यादा बार खाने लगते हैं। धीरे-धीरे घर का संतुलित और पौष्टिक भोजन पीछे छूट जाता है और उसकी जगह तैलीय व रिफाइंड चीजें ले लेती हैं। लगातार इस तरह का भोजन करने से शरीर में अतिरिक्त फैट जमा होने लगता है, वजन बढ़ता है और ब्लड शुगर का स्तर बिगड़ने लगता है। यही स्थिति आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज का कारण बनती है।
विशेषज्ञों के अनुसार मोमोज, चाऊमीन और अन्य जंक फूड में मैदा, रिफाइंड तेल और नमक की मात्रा काफी अधिक होती है। मैदा शरीर में तेजी से ग्लूकोज में बदल जाता है, जिससे ब्लड शुगर अचानक बढ़ता है और इंसुलिन की मांग भी बढ़ जाती है। लंबे समय तक ऐसा होने पर शरीर में इंसुलिन रेजिस्टेंस विकसित हो सकता है, जिसे डायबिटीज की शुरुआती अवस्था माना जाता है। वहीं ज्यादा तेल और नमक का सेवन हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोगों के खतरे को भी बढ़ाता है।
यह समस्या केवल वयस्कों तक सीमित नहीं है। रिसर्च में यह भी पाया गया कि स्कूल और कॉलेज के आसपास फास्ट फूड स्टॉल होने से बच्चों और युवाओं में मोटापा तेजी से बढ़ रहा है। कम उम्र में ही जंक फूड की आदत पड़ने से किशोरों में इंसुलिन रेजिस्टेंस और डायबिटीज का खतरा बढ़ने लगा है।
फास्ट फूड का असर शारीरिक ही नहीं, मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। तैलीय और नमकीन भोजन से थकान, एकाग्रता की कमी और नींद से जुड़ी समस्याएं बढ़ सकती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि संतुलित खान-पान अपनाकर, फास्ट फूड सीमित करके और घर के ताजे भोजन को प्राथमिकता देकर इस खतरे से बचा जा सकता है।








