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मोहन भागवत ने युवाओं से कहा ,- RSS को अफवाहों से नहीं, शाखा में आकर खुद समझें

भारत को विश्वगुरु बनाने का एकमात्र रास्ता हिन्दू समाज का संगठित और गुणवान होना है
सत्यनारायण मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार
गुवाहाटी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने गुवाहाटी में “युवा नेतृत्व सम्मेलन” को संबोधित करते हुए देश के युवाओं से अपील की कि वे संघ के बारे में “पहले से बनी धारणाओं और उद्देश्यपूर्ण प्रचार” के आधार पर कोई राय न बनाएं, बल्कि स्वयं नजदीक से आकर देखें और समझें।
बोरबारी स्थित सुदर्शनालय में आयोजित इस सम्मेलन में असम और पूर्वोत्तर के विभिन्न क्षेत्रों से आए 300 से अधिक युवा प्रतिनिधि मौजूद थे।
संघ का मूल लक्ष्य : एक शक्तिशाली भारत
डॉ. भागवत ने स्पष्ट शब्दों में कहा,
“राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एकमात्र उद्देश्य है – भारत को विश्वगुरु के आसन पर बैठाना। यह तभी संभव है जब समाज एकजुट और गुणवान बने। व्यक्ति बनेगा तो समाज बदलेगा, समाज बदलेगा तो व्यवस्था बदलेगी।” उन्होंने कहा कि जापान, जर्मनी, इजराइल जैसे विकसित देशों ने भी पहले 100 साल तक अपने समाज को एकता और गुणवत्ता के आधार पर मजबूत किया, फिर राष्ट्र ऊंचाइयों पर पहुंचा। भारत को भी यही करना होगा।“विविधता में एकता भारत की ताकत, इसे सम्मान देना ही हिन्दू होना है”
सर्शंघचालक ने भारत की भाषाई-संस्कृति-सांप्रदायिक विविधता को देश की सबसे बड़ी ताकत बताया और कहा,
“दुनिया के किसी देश में विविधता को इतना सम्मान नहीं मिलता। हमारा दर्शन है – मेरा रास्ता सही है, लेकिन तुम्हारे स्थान पर तुम्हारा रास्ता भी सही है। यही हिन्दुत्व है। जो इस विविधता को सम्मान देता है, वही हिन्दू है।”पाकिस्तान का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा, “वहां पंजाबी-सिंधी को जबरन उर्दू बोलनी पड़ती है। भारत से अलग हुए देशों ने अपनी विविधता खो दी।”युवाओं से सीधा आह्वान संघ कोई राजनीतिक संगठन नहीं, यह “सु-मानव निर्माण की प्रक्रिया” है।
भ्रष्टाचार, गो-रक्षा जैसे मुद्दों का स्थायी समाधान केवल चरित्र-निर्माण से ही संभव है।
“भारत के हित” को सर्वोपरि रखते हुए देश को शक्तिशाली बनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं।
पूर्वोत्तर में भी संघ की जड़ें तेजी से मजबूत हो रही हैं।

प्रश्नोत्तर सत्र में भी डॉ. भागवत ने युवाओं के सवालों का खुलकर जवाब दिया। देशभक्ति गीतों से शुरू हुआ यह कार्यक्रम पूर्वोत्तर के युवाओं के लिए संघ को करीब से समझने का एक ऐतिहासिक अवसर बन गया।संघ के शताब्दी वर्ष में शुरू हुए “पंच-परिवर्तन” अभियान का जिक्र करते हुए सरसंघचालक ने कहा,
“जब तक हिन्दू समाज संगठित और गुणवान नहीं बनेगा, भारत का भाग्य नहीं बदलेगा।”

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