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कॉर्पोरेट घरानों के लुट को सुगम बनाने के लिए, प्रवासी मजदूरों पर हो रहा है हमले

देश के मौजूदा आर्थिक संकट की इस दौर में कॉर्पोरेट घरानों की लूट और मुनाफा की रफ्तार को तेज करने के लिए ही देश के विभिन्न हिस्सों में प्रवासी मजदूरों पर हमले किए जा रहे है। इस प्रकार का हमले नए फासीवादी रुझान का ही एक हिस्सा है।आज जारी एक प्रेस बयान में राजमिस्त्री मजदूर रेजा कुली एकता यूनियन के राज्य उपाध्यक्ष नजीब कुरैशी ने बताया कि पिछले 11 वर्षों के मोदी राज में आर्थिक संकट और गहरा हुआ है।सबसे अधिक रोजगार सृजन करने वाले लघु और छोटे उद्योग पर संकट का बादल छाए हुए है । ज्यादातर लघु और मंझोला उद्योग बंद या बीमारग्रस्त अवस्था है। छोटे व्यापारी भी भारी कर्ज में फंसा हुआ है।लघु उद्योगों में कार्य करने वाले मजदूरों को भारी संख्या में रोजगार से निकाला गया है।रोजगार की समस्या के मुख्य कारण सरकार की उस कॉर्पोरेट परास्त आर्थिक नीति है उसे छिपाने के लिए ही आज समाज में प्रवासी मजदूरों को दुश्मन के रूप में चिन्हित कराए जाने की साजिश किया जा रहा है।
आतंकित करो-दबाव बनाओ-नियंत्रण करो
श्री कुरैशी ने कहा कि प्रवासी मजदूरों से ही मालिकों का मुनाफा अधिक होता है क्योंकि भिन्न प्रदेशों से आने के कारण मालिक इनका भरपूर शोषण करते है,इनके लिए कोई न्यूनतम वेतन,श्रम कानून का पालन नहीं होता है।यह प्रवासी मजदूर अपने अधिकारों के लिए आवाज न उठा सके इसलिए शासक वर्ग मालिक इनको आतंकित कर दबाव बनकर नियंत्रित कर रखना चाहते है।मालिकों के इशारों पर ही समाज में फासीवादी विचारधारा के लोग इन प्रवासी मजदूरों को निशाना बनाते है ताकि उनको आतंकित कर रख सके और उन पर मालिकों का पूर्णरूप से नियंत्रण हो। इसलिए आज महाराष्ट्र अस्मिता के नाम पर हिंदीभाषी लोगों पर,कन्नड़ में हिंदी भाषी के खिलाफ और भाजपा शासित राज्यों सरकारों में बांग्लाभाषी प्रवासी मजदूरों को निशाना बनाया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि इस प्रकार की सोच अमरीका के राष्ट्रपति ट्रंप के उस प्रवासी मजदूरों के खिलाफ किया जाने वाले कार्यवाही की मानसिकता के समान है।हिटलर भी यहूदी को निशाना बनाया था,और वर्तमान में उसी विचारधारा को मानने वाले लोग अब प्रवासी मजदूरों को निशाना बनाकर उन्हें आतंकित कर रहे है।
भारतीय नागरिकों को बताया जा रहा है घुसपैठिए
मजदूर नेता ने कहा कि अमेरिका के राष्ट्रपति भारतीय नागरिकों को हथकड़ी पहनाकर बेड़ियों में जकड़कर अमेरिका से भारत भेजा था जिसका सभ्य समाज के हर नागरिकों ने विरोध किया था लेकिन अब हमारे देश की सरकार तो भारत के नागरिकों को ही बंदी और गिरफ्तार कर रख जबरन बांग्लादेश भेज(पुशबैक) रहे है।पश्चिमबंगाल के निवासी जो महाराष्ट्र में मजदूरी करते थे जिनके पास भारतीय नागरिकता का दस्तावेज था उनको भी बांग्लादेश भेज दिया गया। हाल ही में पश्चिम बंगाल के मालदा जिला के एक नागरिक जो मुंबई में कचड़ा बिनने का काम करता था उन्हें बांग्लादेश भेज दिया गया,और उनके परिवार के सदस्यों जो मालदा जिला में निवास करते है उनको भी कोई सूचना नहीं दी गई।
सरकार की घोषणा बकवास साबित हुआ
उन्होंने कहा कि नागरिकता कानून को अमल करते समय गृह मंत्री ने आश्वस्त किया था हिंदुओं को इससे कोई नुकसान नहीं होगा,लेकिन उड़ीसा के नवरंगपुर जिला से जिन 10 बांग्लाभाषियों को गिरफ्तार किया गया उनमें से 9 लोग ही हिंदू बांग्लाभाषी है।
कही पर निगाहे कही पर निशाना
यूनियन नेता ने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार बांग्लादेशी घुसपैठी, रोहिंगा लोगों के नाम पर भारत के आम नागरिकों खासकर बांग्लाभाषी लोगों को निशाना बना रही है।सरकार का दावा है देश में 17 लाख रोहिंगा घुसपैठी है।सिर्फ असम में ही एनआरसी में 19 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से विलोपित किया गया है और उनको मताधिकार से वंचित किया गया है। हैं और अब बिहार में विरोधियों का दावा है करीब 35 लाख लोगों का नाम मतदाता सूची से विलोपित करने का अंदेशा है।17 लाख रोहिंगा और नागरिकता से वंचित असम में ही 19 लाख और अब बिहार में एक अगस्त को ही तस्वीर स्पष्ट होगी। सरकार का गणित को मिला पाना असंभव है।बिहार में चुनाव आयोग पीछे की दरवाजे से नागरिकता कानून को लागू कर रही है।चुनाव आयोग ने पहली बार मतदाताओं को दो हिस्सों में बाटा है।वर्ष 2003 के पहले के मतदाता और वर्ष 2003 के बाद के मतदाता।2003 के बाद के मतदाता को वो दस्तावेज पेश करना होगा जिसमें यह प्रमाणित हो सके वे भारत के नागरिक है।गौरतलब है वर्ष 2003 में बाजपेई के प्रधानमंत्रित्व के समय ही नागरिकता कानून बनाया गया था जब गृहमंत्री आडवाणी थे।
अमीरी गरीबी की असमानता पर पर्दा डालने की साजिश
यूनियन नेता ने बताया कि देश में एक तरफ अदाणी की वार्षिक आय 8.4 लाख करोड़ रुपए और दूसरी तरफ देश के करीब 30 प्रतिशत लोगों की दैनिक आय 100 रुपए यानी वार्षिक 36 हजार रुपए।अदाणी,अंबानी के मुनाफा को और तेजी से वृद्धि करने के लिए ही घुसपैठियों के नाम पर प्रवासी मजदूरों को निशाना बनाकर आतंकित कर उनको दबाया जा रहा है।

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