डैमेज कंट्रोल’ करने आ रहीं शैलजा, हरीश रावत को मनाने और गुटबाजी खत्म करने की चुनौती
रावत को साइडलाइन करने की अपनों ने रची साजिश तो सीएम धामी ने दागा ‘सहानुभूति’ का दांव!
हरीश रावत का ‘मौन’ और धामी के मधुर बोल: उत्तराखंड कांग्रेस में बड़े सियासी तूफान के संकेत!
ममता सिंह, देहरादून।
उत्तराखंड कांग्रेस के भीतर सुलग रही अंतर्कलह अब एक ऐसे मुहाने पर पहुंच गई है जहां पार्टी का भविष्य दांव पर लगा नजर आता है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का सोशल मीडिया पर आया ताजा बयान महज एक भावनात्मक पोस्ट नहीं, बल्कि आलाकमान के लिए एक गंभीर चेतावनी है। सक्रिय राजनीति से ’15 दिनों के ब्रेक’ का दांव खेलकर रावत ने स्पष्ट कर दिया है कि संगठन में अपनी और अपने समर्थकों की उपेक्षा वे अब और बर्दाश्त नहीं करेंगे। यह नाराजगी हाल ही में पार्टी में हुए नए चेहरों के आगमन और नियुक्तियों में रावत खेमे को दरकिनार किए जाने से उपजी है। रावत का यह पैंतरा कांग्रेस के उस पुराने घाव को फिर से हरा कर रहा है, जहां दिग्गज नेताओं की आपसी वर्चस्व की जंग ने अक्सर जीत की संभावनाओं को मटियामेट किया है। रावत के इस रुख से कुमाऊं से लेकर गढ़वाल तक उनके समर्थक लामबंद हो गए हैं और विधायक हरीश धामी जैसे करीबियों द्वारा सामूहिक इस्तीफे की चेतावनी ने संगठन की चूलें हिला दी हैं।
इस स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने उत्तराखंड के इस घटनाक्रम को बेहद गंभीरता से लिया है। दिल्ली दरबार को आभास हो गया है कि यदि हरीश रावत जैसे कद्दावर चेहरे ने चुनावी रण से दूरी बनाई, तो राज्य में पार्टी का ढांचा बिखर सकता है। इसी सियासी आग को बुझाने के लिए प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलजा का 8 अप्रैल से शुरू हो रहा पांच दिवसीय दौरा ‘डैमेज कंट्रोल’ की आखिरी कोशिश माना जा रहा है। शैलजा का मिशन केवल सांगठनिक समीक्षा नहीं, बल्कि उन नाराज क्षत्रपों को एक मेज पर लाना है जो एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहा रहे। वे जिला स्तर तक जाकर यह टटोलेंगी कि गुटबाजी का जहर किस हद तक बूथ स्तर के कार्यकर्ता के भीतर पैठ बना चुका है। उनका प्राथमिक एजेंडा नए और पुराने नेताओं के बीच एक ऐसा संतुलन बनाना है जिससे रावत की नाराजगी दूर हो सके और पार्टी एकजुट दिखे।
कांग्रेस की यह आपसी रार अब चाहरदीवारी से बाहर निकलकर भाजपा के तरकश का तीर बन चुकी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जिस तरह सार्वजनिक मंच से हरीश रावत की अनदेखी पर चुटकी ली, उसने यह साफ कर दिया है कि भाजपा विपक्षी खेमे की इस फूट को अगले विधानसभा चुनाव में भुनाने के लिए पूरी तरह तैयार है। भाजपा ने इसे ‘बुजुर्ग नेताओं के अपमान’ का मुद्दा बनाकर कांग्रेस की घेराबंदी शुरू कर दी है, जिससे कांग्रेस के लिए बचाव करना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में कुमारी शैलजा के इन पांच दिनों के दौरे पर ही उत्तराखंड कांग्रेस की तकदीर टिकी है! यदि वे हरीश रावत के ‘ब्रेक’ को खत्म कराकर उन्हें फिर से मुख्यधारा में सक्रिय नहीं कर पाईं, तो पार्टी की यह अंदरूनी कलह भाजपा के लिए सत्ता की राह और आसान कर देगी।
बहरहाल, एक तरफ जहां कांग्रेस के भीतर से ही रावत जी को साइडलाइन करने की सुगबुगाहट है, वहीं सीएम धामी का यह कहना कि “रावत जी के कद और अनुभव को कोई नकार नहीं सकता”, राज्य की राजनीति में नए संकेत दे रहा है। ऐसे में शैलजा को अब केवल बातें नहीं, बल्कि ठोस समाधान निकालने होंगे, क्योंकि समय तेजी से निकल रहा है और रावत का ‘मौन’ कांग्रेस के लिए बड़ी सियासी मुसीबत का संकेत है।








