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क्या सचमुच भाजपा में विलय कर चुका है चुनाव आयोग? राहुल गांधी के आरोपों से बढ़ा बवाल

आलेख : राजेंद्र शर्मा

नई दिल्ली। सोशल मीडिया पर बीते कुछ हफ्तों से यह मजाक खूब चल रहा था कि चुनाव आयोग अब भाजपा में विलय करने जा रहा है। आयोग ने इसे खारिज तो किया था, लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की हालिया प्रेस कॉन्फ्रेंस ने इस मजाक को और हवा दे दी है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में आयोग की भूमिका रेफरी के बजाय सत्तापक्ष के “खिलाड़ी” जैसी दिखी, जिसने विपक्ष के आरोपों को और धार दे दी है।

असल में यह प्रेस वार्ता ऐसे समय बुलाई गई थी जब चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं। खासतौर पर मतदाता सूचियों में गड़बड़ियों को लेकर उठ रहे विवाद ने आयोग को घेरे में ला दिया है। बिहार में जारी *स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR)* प्रक्रिया और हाल के चुनावों की मतदाता सूचियों में खामियों ने विपक्ष का भरोसा डगमगाया है।

 राहुल गांधी के आरोप और महादेवपुरा विवाद

कर्नाटक की महादेवपुरा विधानसभा सीट का मामला इस विवाद का सबसे बड़ा कारण बना। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने खुद चुनाव आयोग द्वारा जारी मतदाता सूची का विश्लेषण कर यह दावा किया कि करीब छह लाख मतदाताओं में से एक लाख से ज्यादा नाम संदिग्ध हैं। इनमें फर्जी पते, एक ही घर पर दर्ज दर्जनों वोट, बिना फोटो या धुंधली तस्वीर वाले वोटर और यहां तक कि 70-80 साल के “पहली बार वोट डालने वाले” नाम शामिल हैं।

राहुल गांधी ने संसद में भी यह मुद्दा उठाया और आरोप लगाया कि इसी तरह की धांधली पूरे देश में हो रही है। उनका कहना है कि ये गड़बड़ियां भाजपा के पक्ष में चुनावी नतीजों को प्रभावित कर रही हैं।

आयोग का जवाब और विवादित तेवर

राहुल गांधी के आरोपों पर आयोग का रुख हैरान करने वाला रहा। निष्पक्ष जांच का आश्वासन देने के बजाय, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने तीखे अंदाज में कहा कि “या तो राहुल गांधी एक हफ्ते में शपथपत्र देकर अपने आरोप साबित करें, या फिर देश से माफी मांगें।” इस बयान को विपक्ष ने सीधा-सीधा धमकी करार दिया।

सवाल यह भी उठा कि जब भाजपा नेता और सांसद अनुराग ठाकुर ने पहले ही ऐसे आरोप लगाए थे—कि कई क्षेत्रों की मतदाता सूचियों में लाखों वोट हेरफेर से जुड़े हैं—तो उस समय आयोग ने जांच क्यों नहीं की? क्या उस समय इसे आयोग ने “घरेलू मामला” मान लिया था?

 मशीन रीडेबल सूचियों पर टकराव

एक और बड़ा विवाद मतदाता सूचियों के स्वरूप को लेकर है। विपक्ष की मांग है कि मतदाता सूची *मशीन रीडेबल* फॉर्मेट (डिजिटल डेटा) में दी जाए ताकि एआई और कंप्यूटर की मदद से बड़े पैमाने पर गड़बड़ियों का आसानी से पता लगाया जा सके। लेकिन आयोग ने यह मांग ठुकरा दी।

ज्ञानेश कुमार ने निजता (Privacy) और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देकर इस पर रोक की दलील दी। जबकि सच्चाई यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने खुद बिहार की एसआईआर प्रक्रिया में ड्रॉप हुए 65 लाख नामों की सूची *मशीन रीडेबल* रूप में उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था। इतना ही नहीं, बिहार में शुरू में ऐसी सूची ऑनलाइन डाली भी गई थी, लेकिन कुछ ही दिनों में आयोग ने उसे हटा दिया और “नॉन-रीडेबल” फॉर्मेट में बदल दिया।

वीडियोग्राफी का मुद्दा

मतदान केंद्रों की वीडियोग्राफी के रिकॉर्ड तक विपक्ष को न देने की आयोग की दलील भी विवादास्पद रही। चुनाव आयोग ने कहा कि इसमें “बहनों-बहुओं-बेटियों” की तस्वीरें आती हैं, इसलिए यह फुटेज उपलब्ध नहीं कराई जा सकती। विपक्ष का कहना है कि यह सिर्फ धांधलियों को छिपाने का बहाना है।

 बिहार का खास मामला

बिहार में इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और उससे पहले ही एसआईआर प्रक्रिया में लाखों वोटरों के नाम काटे जाने या मृतकों के नाम जोड़े जाने की शिकायतें सामने आई हैं। आयोग यह तक स्पष्ट नहीं कर पाया कि कितने फार्म वैध दस्तावेजों के साथ जमा हुए और कितने बिना दस्तावेजों के।

इस बीच विपक्ष ने ‘वोटर अधिकार यात्रा’ शुरू की है, जिसे जनता का बड़ा समर्थन मिल रहा है। जानकारों का कहना है कि अगर आयोग ने भरोसेमंद तरीके से जवाब नहीं दिए तो चुनावी निष्पक्षता पर विश्वास और कमजोर होगा।

निष्कर्ष

चुनाव आयोग की भूमिका लोकतंत्र में सबसे अहम मानी जाती है। परंतु हालिया घटनाक्रम और प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखा आक्रामक रवैया यह संकेत देता है कि आयोग विपक्ष के सवालों का जवाब देने के बजाय उन्हें दबाने में अधिक रुचि रखता है। सवाल उठना लाजिमी है कि क्या आयोग सचमुच सत्तापक्ष का ही एक हिस्सा बनता जा रहा है?

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