इंदौर।मध्य प्रदेश के गौतमपुरा कस्बे में दिवाली के दूसरे दिन मंगलवार देर शाम 250 साल पुरानी हिंगोट युद्ध परंपरा फिर एक बार दहकती ज्वाला के साथ जीवंत हो उठी। यह आयोजन हर साल की तरह इस बार भी रोमांच, श्रद्धा और खतरे का अद्भुत संगम लेकर आया। जैसे ही शाम ढली, हवा में उड़ते बारूद भरे हिंगोट (सूखे फल) ने आसमान को ज्वाला से रंग दिया।
मैदान के किनारों पर हजारों दर्शक इस अद्भुत लोक परंपरा के साक्षी बने। ढोल-नगाड़ों और नारों के बीच गौतमपुरा का तुर्रा दल और रूणजी गांव का कलंगी दल परंपरागत अंदाज में आमने-सामने उतरे। कुछ ही पलों में दोनों ओर से जलते हिंगोटों की बारिश शुरू हो गई — आग की लपटों से नहाया आसमान मानो युद्ध का रंगमंच बन गया। भीड़ से तुर्रा की जय! और “कलंगी अमर रहे!” के नारे गूंजने लगे।
करीब डेढ़ घंटे तक चले इस ‘आग के खेल’ में इस बार भी कई लोग घायल हुए। ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर वंदना केसरी के मुताबिक, लगभग 35 लोगों को हल्की चोटें आईं, जबकि 9 लोगों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। सुरक्षा के लिए इस बार 200 से ज्यादा पुलिसकर्मी, फायर ब्रिगेड, और एम्बुलेंस दल मौके पर तैनात रहे। भीड़ की अधिकता को देखते हुए कार्यक्रम को तय समय से पहले समाप्त किया गया।
इतिहासकारों के अनुसार, यह परंपरा मराठा-मुगल युद्धों के दौरान जन्मी थी। हथियारों की कमी के चलते ग्रामीणों ने सूखे फलों में बारूद भरकर ‘हिंगोट’ हथियार तैयार किए थे। धीरे-धीरे यह मराठा वीरता का प्रतीक बन गया और बाद में एक लोक-उत्सव के रूप में मनाया जाने लगा।
स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि यह युद्ध वैर नहीं, वीरता और आस्था का प्रतीकहै। इसमें कोई विजेता या पराजित नहीं होता — अंत में दोनों दल एक-दूसरे को गले लगाकर भाईचारे और शौर्य का संदेश देते हैं।
हालांकि, इस आयोजन के खतरे को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा को लेकर सख्त कदम उठाए हैं। 2017 में एक युवक की मौत के बाद यह मामला मध्य प्रदेश हाई कोर्ट तक पहुंचा, जिसके बाद हर साल सुरक्षा इंतजामों को और कड़ा किया गया है।
आज हिंगोट युद्ध न केवल धार्मिक परंपरा, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। दिवाली के बाद यहां के बाजारों में भारी रौनक रहती है। स्थानीय लोग महीनों पहले हिंगोट तैयार करने की तैयारी शुरू कर देते हैं। इस आयोजन से आसपास के इलाकों की स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिलता है — केवल दो दिनों में लाखों रुपये का व्यापार होता है।
जहां आग जलती है, वहां नफरत नहीं — यही हिंगोट युद्ध की सबसे बड़ी खूबसूरती है, जो वीरता, परंपरा और सामूहिकता की ज्वाला को सदियों से जीवित रखे हुए है।








