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‘नीम-हकीम’ से वैज्ञानिक चिकित्सा तक: आयुर्वेद पर डॉ. महेश व्यास का बड़ा खुलासा

आयुर्वेद केवल रोगों के उपचार की पद्धति नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवनशैली और संस्कृति का शास्त्र है। यही कारण है कि आधुनिक दौर में लोग बड़ी संख्या में अन्य चिकित्सा पद्धतियों से आयुर्वेद की ओर रुख कर रहे हैं। अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (AIIA), दिल्ली के डीन डॉ. महेश व्यास ने कहा कि आयुर्वेद का उद्देश्य सिर्फ रोग का इलाज नहीं, बल्कि व्यक्ति को रोगी बनने से रोकना है।

हिन्दुस्थान समाचार समूह की पत्रिका *युगवार्ता* से विशेष बातचीत में डॉ. व्यास ने कहा कि आयुर्वेद को संस्कृति शास्त्र इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह मानव जीवन के आचार, विचार, आहार और व्यवहार को संतुलित करता है। आयुर्वेद वात, पित्त और कफ के सिद्धांत पर आधारित है, जिसका सीधा संबंध व्यक्ति और उसके आसपास के वातावरण से है। मौसम और पर्यावरण में बदलाव का मानव स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

डॉ. व्यास ने बताया कि वर्ष 2017 में शुरू हुए AIIA के पहले ओपीडी से लेकर आज तक संस्थान की यात्रा बेहद सफल रही है। उन्होंने गर्व के साथ कहा कि कोरोना महामारी के दौरान जहां देश-दुनिया के लगभग हर अस्पताल में मौतें हुईं, वहीं AIIA दिल्ली में भर्ती कोरोना के एक भी मरीज की मृत्यु नहीं हुई। यह आयुर्वेदिक चिकित्सा की वैज्ञानिक क्षमता और प्रभावशीलता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

उन्होंने कहा कि लंबे समय तक आयुर्वेद को ‘घास-फूस का शास्त्र’ या धीमी चिकित्सा पद्धति कहकर कमतर आंका गया, लेकिन अब वैज्ञानिक शोधों ने इसकी साख को मजबूत किया है। AIIA ने अब तक 1600 से अधिक शोध पत्र अंतरराष्ट्रीय जर्नलों में प्रकाशित किए हैं, जिनका वैश्विक स्तर पर प्रभाव दिख रहा है।

डॉ. व्यास के अनुसार आयुर्वेद में हर रोगी का इलाज उसकी प्रकृति के अनुसार किया जाता है। एक ही रोग में भी अलग-अलग व्यक्ति को अलग मात्रा और प्रकार की दवा दी जाती है। उन्होंने स्वस्थ जीवन के लिए तीन मूल मंत्र बताए—संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और नियमित व्यायाम।

उन्होंने बताया कि आज AIIA में प्रतिदिन करीब 3000 मरीज उपचार के लिए आते हैं। देशभर में 700 से अधिक आयुर्वेदिक कॉलेजों को मार्गदर्शन देने वाला यह संस्थान आयुर्वेद के प्रति बढ़ते विश्वास और समर्पण का प्रतीक बन चुका है।

 

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