नज़रिया | धर्मपाल धनखड़ करीब छह दशक तक देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बने रहे नक्सलवाद पर केंद्र सरकार ने अब ऐतिहासिक सफलता का दावा किया है। केंद्रीय गृहमंत्री Amit Shah ने संसद में घोषणा की कि भारत अब ‘लाल आतंक’ से मुक्त हो चुका है। उन्होंने इस उपलब्धि का श्रेय सुरक्षा बलों की रणनीतिक कार्रवाई और प्रधानमंत्री Narendra Modi के नेतृत्व को दिया।
गृह मंत्री ने अपने वक्तव्य में बताया कि 2024 से पहले अधिकांश राज्य नक्सल हिंसा से मुक्त हो चुके थे और 2024 से 2026 के बीच सैकड़ों नक्सली मारे गए, हजारों गिरफ्तार हुए तथा बड़ी संख्या में उग्रवादियों ने आत्मसमर्पण किया। इन आंकड़ों को सरकार अपनी नीति की सफलता के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत कर रही है।
नक्सलवाद की जड़ें वर्ष 1967 में पश्चिम बंगाल के Naxalbari क्षेत्र से शुरू हुए किसान आंदोलन में देखी जाती हैं, जो धीरे-धीरे सशस्त्र उग्रवाद में बदल गया। इस आंदोलन का मूल उद्देश्य भूमिहीन किसानों और आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा था, लेकिन समय के साथ यह हिंसक और संगठित विद्रोह का रूप ले बैठा।
बीते दशकों में नक्सल हिंसा ने देश को भारी मानवीय और आर्थिक क्षति पहुंचाई। सुरक्षा बलों और आम नागरिकों सहित हजारों लोगों की जान गई। 2013 में छत्तीसगढ़ के झीरम घाटी में कांग्रेस नेताओं के काफिले पर हुआ हमला इस संघर्ष का सबसे दर्दनाक उदाहरण रहा, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया।
हालांकि, नक्सलवाद के लिए किसी एक राजनीतिक दल या सरकार को पूरी तरह जिम्मेदार ठहराना सरल निष्कर्ष होगा। यह आंदोलन सामाजिक, आर्थिक और वैचारिक कारणों से पनपा और समय के साथ विभिन्न सरकारों की नीतियों तथा सुरक्षा अभियानों ने इसे अलग-अलग स्तर पर प्रभावित किया।
आज जब सरकार नक्सलवाद के अंत की घोषणा कर रही है, तब यह भी जरूरी है कि प्रभावित क्षेत्रों में विकास, शिक्षा और रोजगार की स्थायी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, ताकि हिंसा की जड़ें दोबारा न पनप सकें। किसी भी उग्रवादी आंदोलन के खत्म होने का वास्तविक अर्थ केवल हथियारों का शांत होना नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों का समाप्त होना है, जिनसे वह जन्म लेता है।








