संदीप मिश्रा एवं डॉ. कमलेश कुमार साहू
चांडिल, झारखंड:आज हमने झारखंड के रांची ज़िले के तमार प्रखंड स्थित दिउरी गाँव में अवस्थित प्राचीन माँ देवरी मंदिर का दर्शन किया। यह मंदिर झारखंड के सबसे प्राचीन और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध धार्मिक स्थलों में से एक माना जाता है।
माँ देवरी मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ स्थापित लगभग 700 वर्ष पुरानी 16 भुजाओं वाली ग्राम देवी माँ देवरी की मूर्ति है। यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि सांस्कृतिक और लोक परंपराओं का जीवंत प्रतीक भी है। कुछ वर्ष पूर्व मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया, जिससे इसकी संरचना और सुविधाओं में सुधार हुआ, जबकि इसकी मूल आध्यात्मिक पहचान बनी रही।
मंदिर परिसर में दर्शन के दौरान यह देखा गया कि बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए मंदिर के खंभों, रेलिंगों और अन्य स्थानों पर लाल कपड़ा या चुनरी बाँधते हैं। भारतीय संस्कृति में विशेष रूप से देवी उपासना में लाल रंग को शक्ति, शुभता और ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यह लाल कपड़ा देवी से जुड़ाव, समर्पण और प्रार्थना का प्रतीक होता है—एक ऐसा वचन, जो भक्त और देवी के बीच आध्यात्मिक संबंध को दर्शाता है।
हालाँकि, आधुनिक विमर्श में अक्सर ऐसे धार्मिक अनुष्ठानों को अंधविश्वास कहकर खारिज कर दिया जाता है। परंतु भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ में यह प्रश्न उतना सरल नहीं है। क्या यह केवल अंधविश्वास है, या फिर सदियों से चली आ रही श्रद्धा और सांस्कृतिक आस्था की अभिव्यक्ति?
विशेषज्ञों और समाजशास्त्रियों के अनुसार, जब कोई परंपरा किसी को नुकसान नहीं पहुँचाती, न ही वैज्ञानिक चेतना का विरोध करती है, और व्यक्ति को मानसिक शांति, आशा तथा नैतिक बल प्रदान करती है, तो उसे केवल अंधविश्वास कहना उचित नहीं। ऐसी परंपराएँ अक्सर सामूहिक स्मृति, लोकविश्वास और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी होती हैं।
माँ देवरी मंदिर में लाल कपड़ा बाँधने की परंपरा भी इसी सांस्कृतिक श्रद्धा का उदाहरण है—जहाँ भक्त अपनी आस्था को प्रतीकात्मक रूप में व्यक्त करता है। यह परंपरा न तो किसी को बाध्य करती है और न ही किसी प्रकार की हानि पहुँचाती है, बल्कि लोगों को आशा, विश्वास और आत्मिक संतोष प्रदान करती है।
आज के समय में आवश्यकता इस बात की है कि हम श्रद्धा और अंधविश्वास के बीच संतुलन और विवेक के साथ अंतर करें। भारतीय संस्कृति की गहराई को समझते हुए, वैज्ञानिक सोच और सांस्कृतिक संवेदनशीलता—दोनों को साथ लेकर चलना ही एक प्रगतिशील समाज की पहचान है।
माँ देवरी मंदिर जैसे स्थल हमें यह याद दिलाते हैं कि आस्था केवल विश्वास नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और सामूहिक चेतना का भी प्रतिबिंब होती है।








