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मेला, रैली और त्योहार… भीड़ बढ़ती जा रही है, लेकिन सुरक्षा इंतजाम क्यों नहीं?

हाल ही में बिहार के नालंदा जिले के मघड़ा गांव स्थित शीतला माता मंदिर में भगदड़ मचने से नौ महिलाओं की मौत और कई श्रद्धालुओं के घायल होने की घटना ने एक बार फिर देश में भीड़ प्रबंधन की कमजोर व्यवस्था को उजागर कर दिया है। चैत्र मास के अंतिम मंगलवार को आयोजित मेले में भारी भीड़ उमड़ी थी, लेकिन सुरक्षा और नियंत्रण के पर्याप्त इंतजाम नहीं किए गए थे।

घटना के समय जिला प्रशासन और पुलिस बल का बड़ा हिस्सा उसी दिन आयोजित द्रौपदी मुर्मू के कार्यक्रम की सुरक्षा व्यवस्था में व्यस्त था। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब प्रशासन को मेले और राष्ट्रपति कार्यक्रम दोनों की पूर्व जानकारी थी, तो पर्याप्त पुलिस बल और सुरक्षा इंतजाम क्यों नहीं किए गए।

यह पहली बार नहीं है जब भीड़ नियंत्रण में लापरवाही के कारण निर्दोष लोगों की जान गई हो। इससे पहले महाकुंभ मेला, धार्मिक रथ यात्राओं, राजनीतिक रैलियों और यहां तक कि रेलवे स्टेशनों पर भी ऐसी घटनाएं सामने आ चुकी हैं। हर बार हादसे के बाद जांच और मुआवजे की घोषणा होती है, लेकिन जिम्मेदारों पर कठोर कार्रवाई विरले ही देखने को मिलती है।

भारत जैसे आस्था प्रधान देश में धार्मिक मेलों और आयोजनों में भारी भीड़ जुटना स्वाभाविक है। लेकिन इसके अनुरूप सुरक्षा और प्रबंधन की ठोस व्यवस्था न होना गंभीर प्रशासनिक चूक को दर्शाता है। भीड़ के बीच लोगों के व्यवहार, निकासी मार्ग, सुरक्षा बैरिकेडिंग और प्रशिक्षित कर्मियों की तैनाती जैसे बुनियादी उपाय अक्सर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं।

जब तक भीड़ प्रबंधन को एक गंभीर नीति विषय के रूप में नहीं लिया जाएगा और हर आयोजन के लिए वैज्ञानिक एवं पेशेवर योजना नहीं बनाई जाएगी, तब तक ऐसे हादसे दोहराए जाते रहेंगे। जरूरत इस बात की है कि सरकार, प्रशासन और आयोजन समितियां मिलकर जवाबदेही तय करें और भविष्य के लिए ठोस व प्रभावी रणनीति अपनाएं।

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