देहरादून। अंकिता भंडारी प्रकरण में वीआईपी को जेल भेजने और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग को लेकर सोमवार को देहरादून में जबरदस्त जनाक्रोश देखने को मिला। हजारों की संख्या में लोग मुख्यमंत्री आवास की ओर कूच के लिए सड़कों पर उतर आए। इस दौरान राज्य सरकार के खिलाफ नारेबाजी हुई और प्रदर्शनकारियों व पुलिस के बीच काफी देर तक धक्का-मुक्की भी होती रही। आंदोलनकारियों ने 11 जनवरी को उत्तराखंड बंद का ऐलान कर सरकार पर दबाव और तेज कर दिया है।
उत्तराखंड महिला मंच और मूल निवास भूकानून संघर्ष समिति के आह्वान पर विभिन्न सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों ने मुख्यमंत्री आवास कूच का समर्थन किया था। सुबह 11 बजे से पहले ही परेड ग्राउंड में लोगों की भीड़ जुटनी शुरू हो गई थी। यहां आयोजित सभा को सीपीआई माले के इंद्रेश मैखुरी, उत्तराखंड इंसानियत मंच की कमला पंत और मूल निवास भूकानून संघर्ष समिति के मोहित डिमरी सहित कई वक्ताओं ने संबोधित किया। वक्ताओं ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार अंकिता मामले में प्रभावशाली वीआईपी को लगातार बचाने का प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि सामने आए नए तथ्यों के आधार पर पूरे मामले की दोबारा जांच कराई जानी चाहिए।
सभा के बाद हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारी मुख्यमंत्री आवास की ओर कूच करने लगे। इस कूच में बड़ी संख्या में महिलाएं, बुजुर्ग, छात्र-छात्राएं और युवा शामिल रहे। कांग्रेस, सीपीआई, सीपीएम, समाजवादी पार्टी और उत्तराखंड क्रांति दल के कार्यकर्ताओं ने भी आंदोलन में भागीदारी की। लोग हाथों में तख्तियां लेकर वीआईपी की गिरफ्तारी और अंकिता को न्याय देने की मांग कर रहे थे।
गढ़ी कैंट के पास पुलिस ने बैरिकेडिंग कर प्रदर्शनकारियों को रोक दिया। इसके बाद प्रदर्शनकारी सड़क पर बैठ गए और वहीं जनसभा आयोजित की गई। कुछ युवाओं ने बैरिकेड पार करने का प्रयास किया, जिससे पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव की स्थिति बनी रही।
प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि मुख्यमंत्री या मुख्य सचिव स्वयं आकर ज्ञापन लें, लेकिन प्रशासन की ओर से एसडीएम को भेजे जाने पर आंदोलनकारियों ने कड़ी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि सरकार जनता की आवाज को गंभीरता से नहीं ले रही है। इसी जनसभा में कमला पंत और मोहित डिमरी ने 11 जनवरी को उत्तराखंड बंद का औपचारिक ऐलान किया।
कूच में कांग्रेस की गरिमा दसौनी, सीपीआई के समर भंडारी, सपा के डॉ. एसएन सचान, यूकेडी की प्रमिला रावत सहित कई सामाजिक और राजनीतिक संगठनों के प्रतिनिधि मौजूद रहे।








