देवभूमि उत्तराखंड के पहाड़ इन दिनों गंभीर संकट के दौर से गुजर रहे हैं। भू-वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार राज्य के 448 गांव ऐसे हैं जो निकट भविष्य में प्राकृतिक आपदाओं के कारण पूरी तरह लुप्त हो सकते हैं। इनमें से लगभग 350 गांव अति संवेदनशील श्रेणी में हैं। भारी बारिश, भूस्खलन, भूकंप, पहाड़ खिसकना, बादल फटना और कृत्रिम झीलों के टूटने जैसी घटनाएं इन क्षेत्रों के लिए लगातार खतरा बन रही हैं।
राज्य आपदा प्रबंधन विभाग के अनुसार करीब सात हजार परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर बसाना अत्यंत आवश्यक है, लेकिन सबसे बड़ी समस्या उनके पुनर्वास के लिए उपयुक्त भूमि का अभाव है। प्रदेश का 86 प्रतिशत भूभाग पहाड़ी है और केवल 14 प्रतिशत हिस्सा मैदानी है। इसके अतिरिक्त लगभग 45.44 प्रतिशत क्षेत्र वन क्षेत्र में आता है, जहां कड़े वन कानून लागू हैं। ऐसे में सुरक्षित और समतल जमीन तलाशना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
सीमा से सटे पिथौरागढ़ के 126 गांव सबसे अधिक संवेदनशील हैं, जबकि चमोली, उत्तरकाशी, बागेश्वर और टिहरी के अनेक गांव भी जोखिम में हैं। 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद से अब तक छह हजार से अधिक लोग प्राकृतिक आपदाओं में जान गंवा चुके हैं। जोशीमठ में दरारों के बाद 600 परिवारों का विस्थापन हुआ, लेकिन रोजगार और सुविधाओं के अभाव में कई लोग वापस लौट आए। यह उदाहरण बताता है कि सात हजार परिवारों का पुनर्वास कितना कठिन कार्य होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालयी ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में कृत्रिम झीलें बन रही हैं। इनके टूटने से भारी तबाही हो सकती है। साथ ही बेतरतीब विकास, पर्यटकों का बढ़ता दबाव और प्राकृतिक जल निकासी मार्गों का अवरोध भी हालात बिगाड़ रहे हैं।
अब जरूरत है कि पर्यावरणीय संतुलन को ध्यान में रखते हुए योजनाबद्ध विकास किया जाए, ताकि पहाड़ों की संवेदनशीलता को कम किया जा सके और हजारों परिवारों का भविष्य सुरक्षित रह सके।








