देहरादून। उत्तराखंड में लोकायुक्त का पद पिछले 12 वर्षों से रिक्त पड़ा है, जिसके चलते भ्रष्टाचार से जुड़ी सैकड़ों शिकायतें लंबित होती चली गई हैं। सूचना का अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार 20 मार्च 2026 तक कुल 1732 शिकायतें लोकायुक्त कार्यालय में लंबित हैं, जो नियुक्ति के अभाव में आगे नहीं बढ़ पा रही हैं।
यह जानकारी काशीपुर निवासी आरटीआई कार्यकर्ता नदीम उद्दीन द्वारा मांगी गई सूचना के जवाब में सामने आई। लोक सूचना अधिकारी प्रमोद कुमार जोशी ने पत्रांक 297, दिनांक 20 मार्च 2026 के माध्यम से विस्तृत आंकड़े उपलब्ध कराए।
आंकड़ों के अनुसार 1 नवंबर 2013 से 20 मार्च 2026 तक 1096 भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतें दर्ज की गईं। वहीं, वर्ष 2022 से 2025 के बीच 118 नई शिकायतें सामने आईं और 2026 में अब तक 15 मामलों की सूचना दर्ज की जा चुकी है। शिकायतों की बढ़ती संख्या राज्य में प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
चौंकाने वाली बात यह भी है कि लोकायुक्त की नियुक्ति न होने के बावजूद इस कार्यालय पर अब तक 19.64 करोड़ रुपये से अधिक का खर्च किया जा चुका है। इसके बावजूद शिकायतों के निस्तारण के लिए कोई प्रभावी तंत्र विकसित नहीं हो सका है, जिससे आम जनता में असंतोष बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि लोकायुक्त की नियुक्ति में लगातार हो रही देरी प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी को दर्शाती है। उनका कहना है कि यदि लोकायुक्त सक्रिय होता, तो भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की निष्पक्ष जांच और कार्रवाई संभव हो पाती। इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट और उत्तराखंड हाईकोर्ट द्वारा समय-समय पर सख्त निर्देश भी दिए जा चुके हैं।
प्रदेश सरकार लगातार भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का दावा करती रही है, लेकिन लोकायुक्त पद की लंबे समय से खाली स्थिति इन दावों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रही है।
राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में अब यह मांग तेज हो रही है कि लोकायुक्त की नियुक्ति शीघ्र की जाए, ताकि लंबित शिकायतों का निस्तारण हो सके और जनता का भरोसा प्रशासनिक व्यवस्था पर बना रहे।








