हाल ही में लोकसभा में अभिनेत्री से सांसद बनी कंगना रनौत द्वारा नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के लिए “टपोरी” शब्द का इस्तेमाल किए जाने के बाद यह शब्द चर्चा का केंद्र बन गया है। आमतौर पर स्लैंग या अमानक भाषा को संसदीय गरिमा के अनुरूप नहीं माना जाता, लेकिन जब फिल्मी पृष्ठभूमि वाले लोग राजनीति में आते हैं तो भाषा में भी उसका प्रभाव दिखता है।
“टपोरी” शब्द मूल रूप से मुंबई की सड़क संस्कृति से जुड़ा है। इसे अक्सर सड़कछाप, मवाली या आवारा जैसे अर्थों में लिया जाता है। हालांकि मराठी में इसका एक अर्थ “खिला हुआ” या “पूर्ण विकसित” भी है, लेकिन समय के साथ इसका प्रयोग शरारती, दबंग और ध्यान आकर्षित करने वाले युवाओं के लिए होने लगा।
हिंदी सिनेमा ने इस शब्द को व्यापक पहचान दिलाई। रंगीला, सत्या और मुन्ना भाई एमबीबीएस जैसी फिल्मों में टपोरी किरदारों ने दर्शकों के बीच एक अलग छवि बनाई—मस्तमौला, बिंदास और अपनी ही धुन में रहने वाले युवा। इस तरह “टपोरी” का अर्थ नकारात्मक से आगे बढ़कर एक ‘कूल’ पहचान तक पहुंच गया।
टपोरी भाषा खुद में एक मिश्रित शैली है, जिसमें हिंदी, मराठी, उर्दू और अंग्रेज़ी के बोलचाल के शब्द शामिल होते हैं, जैसे “अपुन”, “भीड़ू”, “कटिंग चाय” आदि। यह भाषा भले ही मानक न हो, लेकिन आम लोगों के बीच इसकी संप्रेषण क्षमता काफी मजबूत है।
दिलचस्प बात यह है कि “टपोरी” शब्द का संबंध “टपरी” यानी चाय की छोटी दुकान से भी जोड़ा जाता है, जहां अक्सर युवाओं का जमावड़ा होता है। वहीं बिहार और पूर्वांचल में प्रचलित “छपरी” शब्द भी इसी तरह के व्यवहार और शैली को दर्शाता है।
राजनीतिक संदर्भ में देखें तो “टपोरी” शब्द का इस्तेमाल स्पष्ट रूप से नकारात्मक भाव में किया गया, लेकिन इसके कई अर्थ इसे पूरी तरह अपमानजनक नहीं बनाते। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की सोच का आईना भी है। ऐसे में इस तरह के शब्दों का प्रयोग राजनीतिक संवाद की गंभीरता पर भी सवाल खड़े करता है।








