गुवाहाटी। असम में मुस्लिम समुदाय से जुड़ा प्रमुख संगठन ‘उलामा ऐक्य मंच’ ने धार्मिक गतिविधियों को लेकर बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया है। मंच ने घोषणा की है कि अब राज्य में किसी भी विदेशी इस्लामी मौलाना या वक्ता को आमंत्रित करने या प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाएगी। संगठन का कहना है कि यह निर्णय असम की स्थानीय संस्कृति और धार्मिक संतुलन की रक्षा के लिए आवश्यक है।
इस फैसले को असम की राजनीति और सामाजिक संतुलन के संदर्भ में एक बड़े कदम के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि राज्य पहले से ही ‘लैंड जिहाद’, अवैध प्रवास और धार्मिक रूपांतरण जैसे संवेदनशील मुद्दों से जूझ रहा है।
🔹 उलामा ऐक्य मंच के प्रमुख फैसले:
- विदेशी इस्लामी वक्ताओं पर पूर्ण प्रतिबंध:
संगठन ने कहा कि राज्य में अब किसी भी विदेशी मौलाना या धार्मिक प्रवक्ता को बुलाना या उनके भाषणों का आयोजन करना प्रतिबंधित होगा। इसका उद्देश्य असम की स्थानीय इस्लामी परंपरा को बाहरी प्रभावों से बचाना है। - हर मोहल्ले में नई धार्मिक सभाओं पर रोक:
मंच ने कहा कि हर कुछ किलोमीटर पर जलसे या धार्मिक सभाओं का आयोजन आवश्यक नहीं है। मौजूदा सभाओं की समीक्षा की जाएगी और नई सभाओं पर रोक लगाई जाएगी। - धार्मिक आयोजनों का व्यावसायिकरण समाप्त:
संगठन ने आरोप लगाया कि कई जलसे अब “धर्म के नाम पर व्यापार” का रूप ले चुके हैं, जहां दान और चंदे का दुरुपयोग होता है। ऐसी सभाओं को अब सख्ती से रोका जाएगा। - मदरसा छात्रों से चंदा वसूली पर प्रतिबंध:
मदरसों के छात्र अब किसी भी प्रकार का चंदा एकत्र नहीं करेंगे। संगठन ने कहा कि यह बच्चों के शोषण को रोकने के उद्देश्य से उठाया गया कदम है। - लाउडस्पीकर पर सख्त नियंत्रण:
अब मस्जिदों या धार्मिक जलसों में तेज आवाज वाले स्पीकरों का उपयोग पूरी तरह वर्जित होगा, खासकर परीक्षा काल के दौरान। अगर किसी को अनुमति भी दी जाती है, तो लाउडस्पीकर का प्रयोग सीमित और निर्धारित समय तक ही होगा।
🔹 राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव:
असम में मुस्लिम आबादी लगभग 34% है, जिसमें असमिया मुसलमान (गोरिया, मोरिया, देसी आदि) और बंगाली मुसलमान शामिल हैं। राज्य की भाजपा सरकार पहले से ही धार्मिक अनुशासन और प्रवासन नियंत्रण पर जोर दे रही है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने हाल ही में कहा था कि “मुसलमानों को भारतीय संस्कृति और संविधान का पालन करना होगा।”
ऐसे में उलामा ऐक्य मंच का यह फैसला सरकार की नीति के अनुरूप माना जा रहा है, हालांकि संगठन ने इसे “पूरी तरह स्वतंत्र और धार्मिक सुधार की दिशा में लिया गया निर्णय” बताया है।
संगठन के प्रवक्ता ने कहा —
“हम असम की धार्मिक परंपराओं को मजबूत बनाना चाहते हैं, न कि बाहरी विचारधाराओं से कमजोर करना। यह फैसला पूरी तरह समुदाय के हित में लिया गया है।”
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह कदम असम में धार्मिक सुधार और कट्टरपंथ पर नियंत्रण की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।








