बिहार की राजनीति एक बार फिर नए समीकरणों और संभावनाओं के दौर से गुजर रही है। राज्य में भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई में नई सरकार के गठन की चर्चाएं तेज हैं। मुख्यमंत्री पद को लेकर भले ही कई नाम सामने आ रहे हों, लेकिन दिलचस्प यह है कि कोई भी नेता खुलकर अपनी दावेदारी पेश नहीं कर रहा है। वहीं, अंदरखाने राजनीतिक हलचल लगातार बढ़ती जा रही है।
हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव ने भी राजनीतिक समीकरणों को नया मोड़ दिया है। विपक्षी दलों की कमजोरी और कुछ विधायकों की अनुपस्थिति का सीधा लाभ भाजपा को मिला, जिससे उसके प्रत्याशी की जीत संभव हो सकी। इससे यह साफ संकेत मिलता है कि विधानसभा में विपक्ष की कमजोर स्थिति सत्ताधारी गठबंधन के लिए फायदेमंद साबित हो रही है।
243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में एनडीए की स्थिति मजबूत दिखाई देती है। भाजपा के साथ सहयोगी दलों की संख्या इतनी है कि सरकार गठन में उन्हें किसी बड़ी चुनौती का सामना नहीं करना पड़ेगा। हालांकि, इन सहयोगी दलों की राजनीतिक हैसियत अब पहले जैसी नहीं रही, जिससे भाजपा की पकड़ और मजबूत होती नजर आ रही है।
राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि यदि भाजपा विपक्षी दलों के विधायकों को अपने पक्ष में कर सकती है, तो सहयोगी दलों में भी सेंध लगाना उसके लिए कठिन नहीं होगा। यह स्थिति खासतौर पर नीतीश कुमार के लिए चुनौतीपूर्ण बनती दिख रही है। यही कारण है कि वे इन दिनों अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ाए हुए हैं और “समृद्धि यात्रा” के जरिए जनता से जुड़ने का प्रयास कर रहे हैं।
इस यात्रा के पीछे सिर्फ जनसंपर्क ही नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी छिपा है। माना जा रहा है कि नीतीश कुमार अपने लंबे शासनकाल की उपलब्धियों को सामने रखकर जनता का समर्थन हासिल करना चाहते हैं, ताकि वे भाजपा के सामने अपनी शर्तें मजबूती से रख सकें। इनमें उनके पुत्र निशांत कुमार को राजनीति में स्थापित करने की इच्छा भी शामिल मानी जा रही है।
जद(यू) के भीतर भी निशांत कुमार को लेकर चर्चाएं तेज हैं। कुछ नेता उन्हें भविष्य के नेतृत्व के रूप में देख रहे हैं। हाल के आयोजनों में उनकी सक्रियता और सार्वजनिक उपस्थिति ने इन अटकलों को और हवा दी है।
दूसरी ओर, भाजपा भी इस बात को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं दिखती कि नीतीश कुमार आसानी से मुख्यमंत्री पद छोड़ देंगे। हालांकि, उनकी सेहत और वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियां इस ओर इशारा करती हैं कि वे सम्मानजनक तरीके से अपनी भूमिका तय करना चाहेंगे। ऐसे में सम्राट चौधरी का नाम मुख्यमंत्री पद की दौड़ में प्रमुखता से सामने आ रहा है।
फिर भी, भाजपा की राजनीति का इतिहास बताता है कि अक्सर वही चेहरा सामने आता है जिसकी चर्चा कम होती है। इसलिए अंतिम निर्णय को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है।
इन सबके बीच उपमुख्यमंत्री पद को लेकर भी जोरदार खींचतान की संभावना है। यदि जद(यू) अपने कोटे से किसी को इस पद पर देखना चाहता है, तो भाजपा के वर्तमान दावेदारों और मौजूदा उपमुख्यमंत्रियों के लिए स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि नई सरकार में कितने उपमुख्यमंत्री होंगे और किन-किन दलों को प्रतिनिधित्व मिलेगा।
स्पष्ट है कि बिहार में सरकार गठन के साथ ही मंत्रिपरिषद में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। विभागों का बंटवारा, नौकरशाही में फेरबदल और राजनीतिक संतुलन—सब कुछ नए सिरे से तय होगा। इसीलिए सत्ता के गलियारों में मंत्री से लेकर अधिकारी तक अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश में जुटे हैं।
अंततः यह तय माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री पद का अंतिम फैसला नरेंद्र मोदी और अमित शाह की सहमति से ही होगा। लेकिन उपमुख्यमंत्री पद को लेकर सियासी रस्साकशी अभी और तेज होने की पूरी संभावना है।








