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शिक्षा या कारोबार? हर साल बदलती किताबें और महंगी यूनिफॉर्म पर तीखा व्यंग्य

आज के समय में बच्चों को स्कूल भेजना केवल शिक्षा दिलाने का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि यह एक महंगे  ‘सब्सक्रिप्शन मॉडल’  जैसा अनुभव देने लगा है। पहले लोग पूछते थे कि बच्चा किस कक्षा में पढ़ता है, लेकिन अब अभिभावकों के बीच चर्चा का विषय यह होता है कि इस बार किताबों और यूनिफॉर्म पर कितना खर्च हुआ।

अधिकांश निजी स्कूलों का एक तयशुदा बुक-सेलर होता है, जहां से ही अभिभावकों को किताबें खरीदनी पड़ती हैं। शहर में अन्य किसी दुकान पर वही किताबें उपलब्ध नहीं होतीं, जिससे अभिभावक मजबूरी में लंबी कतारों में लगकर वही महंगी पुस्तकें खरीदते हैं। हर साल नई एडिशन के नाम पर किताबों में मामूली बदलाव किए जाते हैं, ताकि पुरानी किताबें दोबारा इस्तेमाल न हो सकें और अभिभावकों को फिर से पूरा सेट खरीदना पड़े।

यूनिफॉर्म की स्थिति भी अलग नहीं है। स्कूल ड्रेस अब साधारण पोशाक न रहकर एक तरह की ‘डिज़ाइनर वियर’ बन गई है। टाई, जुराबों या शर्ट के रंग में हल्का सा बदलाव कर दिया जाता है, जिससे पिछले साल की ड्रेस बेकार हो जाती है। अभिभावकों को मजबूरन हर साल नई यूनिफॉर्म खरीदनी पड़ती है, जिसकी कीमत कई बार सामान्य कपड़ों से कहीं अधिक होती है।

मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए नया सत्र शुरू होना किसी तनावपूर्ण परीक्षा से कम नहीं होता। अप्रैल का महीना आते ही फीस, किताबें, ड्रेस और अन्य शुल्क मिलाकर खर्च इतना बढ़ जाता है कि परिवार का पूरा बजट डगमगा जाता है। कई माता-पिता मजाक में कहते हैं कि बच्चों की पढ़ाई से ज्यादा उन्हें वित्तीय प्रबंधन सीखना पड़ रहा है।

कभी कहा जाता था “विद्या ददाति विनयम्” , अर्थात शिक्षा विनम्रता देती है। लेकिन आज की परिस्थितियों में यह कहावत व्यंग्य का रूप ले चुकी है, जहां शिक्षा के साथ-साथ भारी भरकम बिल भी जुड़ गया है। जब तक किताबों, यूनिफॉर्म और अन्य सामग्री के इस तंत्र में पारदर्शिता नहीं आएगी, तब तक शिक्षा का मंदिर कई लोगों को एक महंगे कॉर्पोरेट शोरूम जैसा ही प्रतीत होता रहेगा।

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