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डूबने से बंगाल में हर दिन 25 मौतें, आधे पीड़ित बच्चे: सर्वे रिपोर्ट

कोलकाता: पश्चिम बंगाल में हर दिन औसतन 25 लोग डूबकर अपनी जान गंवा रहे हैं, और इसमें से आधे पीड़ित बच्चे होते हैं। यह चौंकाने वाली जानकारी विश्व जल डूब रोकथाम दिवस के मौके पर जारी किए गए एक नए अध्ययन से सामने आई है। इस अध्ययन ने राज्य में डूबने से होने वाली मौतों की भयावह सच्चाई को उजागर किया है और यह सर्वे जॉर्ज इंस्टिट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ द्वारा किया गया है, जिसे देश का अब तक का सबसे बड़ा सामुदायिक स्तर का डूबने संबंधी सर्वे बताया गया है।

अध्ययन में राज्य के 23 जिलों की 1.80 करोड़ की आबादी को कवर किया गया और लगभग 15,000 समुदाय के लोगों से जानकारी जुटाई गई। रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में हर साल औसतन 9,191 लोग डूबकर जान गंवाते हैं, जो पहले के आधिकारिक आंकड़ों से तीन गुना ज्यादा है।

बच्चों के लिए डूबने का खतरा ज्यादा

जॉर्ज इंस्टिट्यूट की डॉ. मेधावी गुप्ता ने कहा, “ग्रामीण इलाकों में डूबने की घटनाएं एक बड़ी त्रासदी बन चुकी हैं, लेकिन ज्यादातर मामलों में बच्चों की मौत की रिपोर्टिंग नहीं होती, जिससे असल आंकड़े सामने नहीं आ पाते। स्वास्थ्य तंत्र की कमजोरियां भी आंकड़ों को गलत तरीके से पेश करती हैं।”

अध्ययन में यह पाया गया है कि डूबने से मरने वालों में सबसे अधिक जोखिम एक से 9 साल के बच्चों को है। खासकर एक से दो साल के बच्चों में यह खतरा 30 प्रतिशत ज्यादा होता है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ज्यादातर हादसे दिन के दोपहर 12 बजे से दो बजे के बीच होते हैं और यह घटनाएं घर से महज 50 मीटर के दायरे में होती हैं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 93 प्रतिशत मामलों में बच्चे उस वक्त डूबे, जब उनके आसपास कोई वयस्क मौजूद नहीं था। यह संकेत करता है कि बच्चों की निगरानी की कमी और सुरक्षा उपायों की अदूरदर्शिता एक बड़ा कारण बन रही है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की चिंता

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), भारत के डॉ. बी. मोहम्मद असील ने कहा कि पिछले दो दशकों में दुनियाभर में डूबने से होने वाली मौतों में 38 प्रतिशत की कमी आई है, लेकिन निम्न और मध्यम आय वाले देशों में हालात अभी भी खराब हैं। उन्होंने यह भी कहा, “डूबने की रोकथाम के लिए हमारे पास कारगर उपाय पहले से मौजूद हैं, अब जरूरत है उन्हें ज़मीन पर लागू करने की।”

बचाव की कमजोरियां

रिपोर्ट के अनुसार, अधिकांश मामलों में बचाव के प्रयास या तो नहीं किए गए या फिर बहुत गलत तरीके से किए गए। कई मामलों में उल्टी कराना या बच्चे को उल्टा घुमा देना जैसे अवैज्ञानिक उपाय अपनाए गए। केवल 10 प्रतिशत पीड़ितों को सही तरीके से सीपीआर (कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन) दिया गया और केवल 12 प्रतिशत मामलों में चिकित्सकीय सहायता ली गई।

यह आंकड़े साफ बताते हैं कि डूबने की घटनाओं के बाद सही इलाज और बचाव के उपायों की भारी कमी है। सही समय पर चिकित्सा सहायता न मिलने और गलत तरीकों के कारण कई जानें जा रही हैं, जो पूरी तरह से रोकी जा सकती हैं।

सुरक्षा के उपाय और सुझाव

रिपोर्ट में सुरक्षा के कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं:

  1. तालाबों और जलाशयों के आसपास बाड़ लगाना – छोटे बच्चों की सुरक्षा के लिए यह एक जरूरी कदम हो सकता है।

  2. सामुदायिक स्तर पर सीपीआर और बचाव प्रशिक्षण – चूंकि 90 प्रतिशत मामलों में पहला रेस्पॉन्डर आम ग्रामीण होता है, इसलिए इस तरह की प्रशिक्षण व्यवस्था बहुत जरूरी है।

  3. तैराकी की प्रारंभिक ट्रेनिंग – बच्चों को तैराकी की प्रारंभिक ट्रेनिंग देना एक दीर्घकालिक समाधान हो सकता है, जो भविष्य में दुर्घटनाओं को कम कर सकता है।

सामाजिक जागरूकता का महत्व

चाइल्ड इन नीड इंस्टिट्यूट (CINI) के नेशनल एडवोकेसी ऑफिसर सुजॉय रॉय ने कहा कि “ये सभी मौतें 100 प्रतिशत रोकी जा सकती हैं। अगर छोटे बच्चों पर थोड़ी सी निगरानी रखी जाए, तो हर जान बचाई जा सकती है।” उन्होंने यह भी कहा कि यह आंकड़ा सतही है, और अगर इस मुद्दे पर और गहरे अध्ययन किए जाएं, तो स्थिति और भी गंभीर सामने आ सकती है।

ब्लूमबर्ग फिलैंथ्रॉपीज़ का सहयोग

यह अध्ययन ब्लूमबर्ग फिलैंथ्रॉपीज़ के सहयोग से किया गया था, और यह सामुदायिक स्तर पर डूबने से होने वाली मौतों को रोकने के लिए एक ठोस आधार तैयार कर रहा है। रिपोर्ट के निष्कर्षों के आधार पर, यदि स्थानीय स्तर पर जागरूकता और बचाव के उपायों को सुदृढ़ किया जाए तो पश्चिम बंगाल में डूबने से होने वाली मौतों में भारी कमी लाई जा सकती है।

निष्कर्ष

पश्चिम बंगाल में डूबने से होने वाली मौतों की रिपोर्ट ने राज्य में बच्चों की सुरक्षा के मुद्दे को एक नई दिशा दी है। यह समय की आवश्यकता है कि इस समस्या पर और ध्यान दिया जाए और डूबने की घटनाओं की रोकथाम के लिए प्रभावी उपाय लागू किए जाएं। बच्चों की सुरक्षा, सामुदायिक जागरूकता और सही बचाव उपायों से पश्चिम बंगाल में इन दुखद मौतों पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है।

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