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पानी में डूबा रहता है पूरा बांध, फिर भी नहीं टूटी इसकी ताकत! जानिए हिरेभास्कर डैम का अनोखा रहस्य

कर्नाटक के शिवमोग्गा जिले में स्थित हिरेभास्कर बांध आज भी अपनी अनूठी इंजीनियरिंग और ऐतिहासिक महत्व के कारण लोगों को आकर्षित करता है। खास बात यह है कि यह बांध साल के अधिकांश समय पानी के भीतर डूबा रहता है और केवल मई-जून के दौरान ही दिखाई देता है। इसी वजह से इसे भारत की सबसे रहस्यमयी और अद्भुत इंजीनियरिंग संरचनाओं में गिना जाता है।

शरावती नदी पर मैसूर रियासत के शासनकाल में वर्ष 1939 से 1948 के बीच निर्मित हिरेभास्कर बांध उस दौर की तकनीकी क्षमता का शानदार उदाहरण माना जाता है। हालांकि 1960 के दशक में शरावती जलविद्युत परियोजना के तहत विशाल लिंगनमक्कि बांध का निर्माण हुआ, जिसके बाद बने जलाशय में हिरेभास्कर बांध पूरी तरह जलमग्न हो गया। इसके बावजूद यह संरचना आज भी मजबूती के साथ खड़ी है।

करीब 350 मीटर लंबे इस बांध की सबसे बड़ी विशेषता इसकी उन्नत सिफ़न प्रणाली है। प्रसिद्ध सिविल इंजीनियर गणेशन अय्यर द्वारा डिजाइन किए गए इस बांध में 11 स्वचालित सिफ़न लगाए गए थे। ये सिफ़न बाढ़ के दौरान अतिरिक्त पानी को बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के स्वतः बाहर निकाल देते थे। उस समय के लिए यह तकनीक बेहद आधुनिक मानी जाती थी और आज भी इंजीनियर इसकी कार्यकुशलता और दूरदर्शी डिजाइन की सराहना करते हैं।

जब जलाशय का जलस्तर कम होता है और बांध सतह पर उभरकर सामने आता है, तब यह पर्यटकों, शोधकर्ताओं और इंजीनियरिंग के विद्यार्थियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाता है। सागर तालुक के शिंगनूर क्षेत्र के निकट स्थित इस ऐतिहासिक स्थल तक नाव या फेरी के माध्यम से पहुंचा जा सकता है।

चारों ओर फैले शरावती नदी के बैकवाटर और प्राकृतिक हरियाली के बीच स्थित हिरेभास्कर बांध न केवल प्रकृति की सुंदरता को दर्शाता है, बल्कि भारत की ऐतिहासिक इंजीनियरिंग दक्षता और दूरदर्शी निर्माण तकनीकों का भी जीवंत प्रमाण प्रस्तुत करता है। दशकों तक पानी में डूबे रहने के बावजूद इसकी मजबूती आज भी लोगों को हैरान कर देती है।

 

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